प्रयागराज यानी इलाहाबाद का कुंभ मेला इस बार कई वजहों से चर्चा में है. उन तमाम वजहों में से एक है- किन्नर अखाड़ा. रोशनी में डूबी कुंभनगरी में अमूमन हर शख़्स की ज़बान पर किन्नर अखाड़े का नाम है. हालांकि अखाड़ों को मान्यता देने वाली संस्था अखाड़ा परिषद इसे अखाड़ा मानने से इनकार करती है.
साल 2019 के कुंभ मेले के शुभारंभ की तैयारियां ज़ोंरों पर थीं, जब किन्नर अखाड़े के पदाधिकारी शाही पेशवाई लेकर शहर में दाख़िल हुए.
शहर से उनकी पेशवाई निकली तो लोग पहली बार किन्नरों को इस तरह देखकर दंग थे. साल 2016 में उज्जैन कुंभ मेले से चर्चा में आए किन्नर अखाड़े ने प्रयागराज के कुंभ में जूना अखाड़े से हाथ मिलाया और उसी के साथ आगे बढ़ने का फ़ैसला लिया. हालांकि इस फ़ैसले को लेकर किन्नर अखाड़ा की आचार्य महामंडलेश्वर और अखाड़ा प्रमुख लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कहती हैं कि ये किन्नर अखाड़े का जूना अखाड़े में विलय नहीं है.
इस बात से जूना अखाड़े के संरक्षक हरि गिरि भी सहमत दिखते हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा कि ये कहना बिल्कुल ग़लत होगा कि किन्नर अखाड़े का जूना अखाड़े में विलय हो गया है. किन्नर अखाड़ा एक अलग संगठन है जो आगे भी रहेगा.
किन्नरों के लिए अलग से अखाड़ा बनाने की ज़रूरत के सवाल पर लक्ष्मी कहती हैं, ''किन्नर अखाड़ा बनाने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि किन्नर समुदाय का पतन सनातन धर्म से हुआ था और किसी ने उनकी सुध नहीं ली. साल 2014 में जब सुप्रीम कोर्ट ने हमें तीसरे जेंडर के तौर पर पहचान दी तो मुझे लगा कि किन्नरों को मान-सम्मान दिलाने के लिए धर्म से अच्छा रास्ता कुछ और नहीं हो सकता. लेकिन मैं स्पष्ट कर दूं कि मुझे किसी पद का लालच नहीं है, मैं ख़ुद को इस गद्दी की वॉचमैन समझती हूं.''
उन्होंने कहा, ''जूना अखाड़ा का माइंडसेट किन्नरों के प्रति काफ़ी अच्छा रहा है और हमें जिस तरह उन्होंने अपने साथ रखा वो हमारे लिए सम्मान की बात है. हमें जूना अखाड़े ने बड़ी उदारता से अपनाया.''
किन्नर अखाड़ा की महामंडलेश्वर भवानी नाथ वाल्मीकि कहती हैं, ''अखाड़ा बनाने की ज़रूरत इसलिए पड़ी क्योंकि हमें मुख्यधारा से जुड़ना है. समाज के लोग हमें स्वीकार नहीं करते. लेकिन अपनी बात रखने और मनवाने के लिए धर्म सबसे अच्छी चीज़ है. सबको पूजा और सम्मान का अधिकार है तो किन्नर समाज के साथ भी वैसा ही बर्ताव हो.''
किन्नर अखाड़ा बनाने की बात जब शुरू हुई तो किन्नर समुदाय के लोगों ने ही इसका विरोध करना शुरू किया. किन्नर समुदाय में विरोध की वजह भी धर्म है. यही नहीं, सनातन परंपरा पर बने 13 अखाड़ों ने भी शुरुआत से ही किन्नरों का अलग अखाड़ा बनाने का विरोध किया.
अखाड़ों को मान्यता देने वाली संस्था अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि का मानना है कि किन्नर अखाड़ा का कोई अस्तित्व सनातन परंपरा में नहीं है और आगे चलकर भी इसे 14वें अखाड़े के तौर पर मान्यता नहीं मिलेगी.
नरेंद्र गिरि ने कहा, ''कोई किन्नर अखाड़े की मान्यता नहीं है. 13 अखाड़े हैं और 13 ही रहेंगे. वैसे भी वो जूना अखाड़े में समाहित हो गया है तो उसका कोई अस्तित्व अब रहा नहीं. किन्नर एक ऐसा समुदाय है जो किसी से अलग थोड़ी है. लक्ष्मी त्रिपाठी आई हैं, वही थोड़ा हल्ला कर रही हैं, लेकिन इससे कुछ हासिल नहीं होगा. जूना अखाड़ा में हैं वो लेकिन आगे चलकर जूना से भी वो बाहर हो जाएंगे, इसमें दोराय नहीं है. संन्यास परंपरा में किन्नरों को संन्यास लेने का अधिकार नहीं है. उन्होंने लालच में अगर ऐसा किया है तो ये किन्नर समुदाय का अपमान है.''
उन्होंने कहा, ''अपने घर में कोई ख़ुद को प्रधानमंत्री घोषित कर ले तो हर कोई थोड़ी मान लेगा. लेकिन मान्यता सिर्फ़ 13 अखाड़ों की है और वही रहेंगे. किन्नरों को संन्यास दिलाने वाले भी पाप के भागी होंगे क्योंकि शास्त्रों में किन्नरों को संन्यास दिलाने का कोई विवरण नहीं हैं.''
यही नहीं, किन्नर अखाड़े की कई पदाधिकारियों ने ये बात मानी कि अखाड़ा बनाने से पहले उन्हें अपने ही समाज के लोगों से विरोध झेलना पड़ा क्योंकि उनमें से बहुतायत इस्लाम को मानने वाले हैं. इस्लाम को मानने वाले किन्नर अखाड़ा बनाने के ख़िलाफ़ थे क्योंकि वो अपना धर्म छोड़कर हिंदू रीति-रिवाज नहीं अपनाना चाहते थे.
दिलचस्प बात ये है कि किन्नर अखाड़े की उत्तर भारत की महामंडलेश्वर भवानी ने ख़ुद इस्लाम छोड़कर हिंदुत्व को अपनाया है. वो हज पर भी जा चुकी हैं. हालांकि साल 2010 में इस्लाम धर्म को अपनाने से पहले वो हिंदू थीं.
वो कहती हैं, ''मैं लगातार हो रहे भेदभाव से परेशान हो गई थी और इसीलिए मैंने इस्लाम को अपनाया. मैं हज पर भी गई. मुझे इस्लाम ने नमाज़ पढ़ने की आज़ादी दी, मुझे हज पर जाने दिया. लेकिन जब मुझे मौक़ा मिला कि मैं अपनी सनातन परंपरा में वापस आ जाऊं और इसमें रहकर अपने समाज के लिए कुछ कर सकती हूं तो मैं आ गई. घर वापसी की कोई सज़ा थोड़ी है.''
Thursday, January 24, 2019
Wednesday, January 16, 2019
आयुष्मान भारत योजना छत्तीसगढ़ में बंद होगी
छत्तीसगढ़ से शुरु हुई मोदी केयर के नाम से दुनिया भर में प्रचारित प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना 'आयुष्मान भारत' अब छत्तीसगढ़ में ही बंद होने जा रही है.
इससे पहले पश्चिम बंगाल ने भी इस योजना को बंद करने की घोषणा की है.
दिल्ली, केरल, ओडिशा, पंजाब और तेलंगाना पहले ही इस योजना को लागू करने से इंकार कर चुके हैं.
केंद्र की भाजपा सरकार इसे दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना होने का दावा करती रही है.
इस योजना के तहत हर साल प्रति परिवार को 5 लाख रुपए के स्वास्थ्य बीमा की बात की गई थी.
पिछले महीने छत्तीसगढ़ में सत्ता में आई कांग्रेस पार्टी की सरकार का आरोप है कि इस योजना से आम जनता को कोई लाभ नहीं मिल रहा है.
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा, "इस योजना में 100 से ज्यादा बीमारियों के संदर्भ में, बीमारी के इलाज के लिये एक नया पैसा नहीं है. बीमारी हो जाने के बाद, उसके ऑपरेशन के लिये पैसा है. ये दूषित योजना है."
इस योजना के तहत 40 फीसदी रकम का भुगतान राज्य सरकार करती है. सिंहदेव का कहना है कि राज्य अगर आयुष्मान भारत योजना को बंद कर दे तो भी अपने बजट से राज्य सरकार यूनिवर्सल हेल्थकेयर स्कीम के तहत उससे बेहतर स्वास्थ्य सेवा सुविधा उपलब्ध कराने में सक्षम है.
सिंहदेव ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "हम उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे और हेल्थ फॉर ऑल को लागू करेंगे."
रमन सिंह कहते हैं, "ये देश की सबसे बड़ी योजना है और मैं समझता हूं कि यह दुनिया की सबसे बड़ी योजना है. राज्य सरकार अगर इस योजना को लेकर कोई निर्णय लेती है तो गरीबों के हक़ में, उनका ध्यान रखकर निर्णय लेना चाहिये."
साल 2008 में देशभर में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना लागू की गई थी जिसमें गरीब परिवार के लोगों को चिकित्सा सुविधा का लाभ देने का प्रावधान था.
इसके बाद साल 2012 में छत्तीसगढ़ सरकार ने मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना शुरु की. इस योजना में उन लोगों को शामिल किया गया, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के दायरे से बाहर थे.
पिछले साल 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजापुर से प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना 'आयुष्मान भारत' की शुरुआत करते हुये दावा किया था कि इस योजना से इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी मुश्किलें आसान हो जायेंगी.
राज्य सरकार ने दावा किया था कि राज्य के 57.14 लाख परिवारों में से 37.29 लाख परिवारों को इस योजना में शामिल किया गया है.
लेकिन राज्य भर के डॉक्टर लगातार इस योजना का विरोध कर रहे थे.
पिछले कई महीनों से डॉक्टरों ने इस योजना के तहत इलाज का काम छत्तीसगढ़ में बंद कर रखा था.
इससे पहले पश्चिम बंगाल ने भी इस योजना को बंद करने की घोषणा की है.
दिल्ली, केरल, ओडिशा, पंजाब और तेलंगाना पहले ही इस योजना को लागू करने से इंकार कर चुके हैं.
केंद्र की भाजपा सरकार इसे दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना होने का दावा करती रही है.
इस योजना के तहत हर साल प्रति परिवार को 5 लाख रुपए के स्वास्थ्य बीमा की बात की गई थी.
पिछले महीने छत्तीसगढ़ में सत्ता में आई कांग्रेस पार्टी की सरकार का आरोप है कि इस योजना से आम जनता को कोई लाभ नहीं मिल रहा है.
राज्य के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने कहा, "इस योजना में 100 से ज्यादा बीमारियों के संदर्भ में, बीमारी के इलाज के लिये एक नया पैसा नहीं है. बीमारी हो जाने के बाद, उसके ऑपरेशन के लिये पैसा है. ये दूषित योजना है."
इस योजना के तहत 40 फीसदी रकम का भुगतान राज्य सरकार करती है. सिंहदेव का कहना है कि राज्य अगर आयुष्मान भारत योजना को बंद कर दे तो भी अपने बजट से राज्य सरकार यूनिवर्सल हेल्थकेयर स्कीम के तहत उससे बेहतर स्वास्थ्य सेवा सुविधा उपलब्ध कराने में सक्षम है.
सिंहदेव ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "हम उसी दिशा में आगे बढ़ेंगे और हेल्थ फॉर ऑल को लागू करेंगे."
रमन सिंह कहते हैं, "ये देश की सबसे बड़ी योजना है और मैं समझता हूं कि यह दुनिया की सबसे बड़ी योजना है. राज्य सरकार अगर इस योजना को लेकर कोई निर्णय लेती है तो गरीबों के हक़ में, उनका ध्यान रखकर निर्णय लेना चाहिये."
साल 2008 में देशभर में राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना लागू की गई थी जिसमें गरीब परिवार के लोगों को चिकित्सा सुविधा का लाभ देने का प्रावधान था.
इसके बाद साल 2012 में छत्तीसगढ़ सरकार ने मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना शुरु की. इस योजना में उन लोगों को शामिल किया गया, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के दायरे से बाहर थे.
पिछले साल 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजापुर से प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना 'आयुष्मान भारत' की शुरुआत करते हुये दावा किया था कि इस योजना से इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ी मुश्किलें आसान हो जायेंगी.
राज्य सरकार ने दावा किया था कि राज्य के 57.14 लाख परिवारों में से 37.29 लाख परिवारों को इस योजना में शामिल किया गया है.
लेकिन राज्य भर के डॉक्टर लगातार इस योजना का विरोध कर रहे थे.
पिछले कई महीनों से डॉक्टरों ने इस योजना के तहत इलाज का काम छत्तीसगढ़ में बंद कर रखा था.
Tuesday, January 8, 2019
बिहार में टीचर्स को 'जाति के आधार पर' मिलेगा वेतन, क्या है सच?
सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है कि बिहार में अब शिक्षकों को जाति के आधार पर वेतन बांटा जाएगा.
इसे मोदी सरकार के सामान्य वर्ग के ग़रीब लोगों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने के फ़ैसले से जोड़कर भी शेयर किया जा रहा है.
कुछ लोगों ने लिखा है, "एक ही विद्यालय में काम करने वाले दो अलग जाति के शिक्षकों में से एक जाति विशेष के टीचर को वेतन देने में प्राथमिकता. भले ही अल्पसंख्यक व पिछड़ी जाति के शिक्षकों को तीन माह तक वेतन न मिले."
जबकि कुछ लोगों ने फ़ेसबुक पर पोस्ट किया है कि "मोदी सरकार का फ़ैसला, जाति के आधार पर करें वेतन भुगतान. एससी/एसटी कर्मचारियों को पहले वेतन दे बिहार सरकार."
वहीं कुछ लोगों ने बिहार की स्थानीय वेबसाइटों में छपी ख़बरों का लिंक भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है.
इन्हीं में से एक वेबसाइट ने दावा किया है कि 'नई नीति के आधार पर ही शिक्षकों को अक्तूबर और नवंबर का वेतन दिया गया है और कई जातियों के शिक्षकों का वेतन अभी भी अटका हुआ है'. वेबसाइट के अनुसार 6 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने इस ख़बर को सोशल मीडिया पर शेयर किया है.
लेकिन ये सभी दावे ग़लत हैं. अपनी पड़ताल में बीबीसी ने पाया कि बिहार सरकार ने ऐसी कोई 'नई नीति' नहीं बनाई है जिसके तहत शिक्षकों को जाति के आधार पर वेतन दिया जाए.
बिहार की शिक्षा परियोजना परिषद् के राज्य परियोजना निदेशक संजय सिंह ने बीबीसी को बताया कि बिहार सरकार ने ऐसी कोई नीति नहीं बनाई है जिसके तहत शिक्षकों को उनकी जाति के आधार पर वेतन दिया जाएगा.
उन्होंने कहा, "3 जनवरी को हमने प्रारंभिक स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का दो महीने का बकाया वेतन उपलब्ध कराया था. वेतन की राशि हमेशा की तरह हमने दो मदों (जेनरल और एससी) में भेजी थी. लेकिन राज्य के ज़िलाधिकारियों को लिखे गए इस आधिकारिक पत्र को लोगों ने ग़लत समझा."
संजय सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार शिक्षा से जुड़ी केंद्र प्रायोजित योजनाओं जैसे सर्व शिक्षा अभियान के लिए जो पैसा राज्य सरकार को भेजती है, उसे दो मदों (जेनरल और एससी) में ही भेजा जाता है.
संजय सिंह ने कहा कि सरकार फ़ंड में इस तरह का बंटवारा लेखांकन और ऑडिट के लिए करती है.
बिहार के राज्य प्राथमिक शिक्षा संघ के कार्यकारी अध्यक्ष मिथिलेश शर्मा ने बीबीसी को बताया कि वेतन में अनियमितता को लेकर प्राथमिक शिक्षकों की काफ़ी शिकायतें हैं. लेकिन जिस तरह से अक्तूबर और नवंबर का वेतन जनवरी में जारी किया गया और आदेश में दो मदों का ज़िक्र किया गया, इससे शिक्षकों में ये चर्चा ज़रूर उठी थी कि क्या अब सरकार जाति के आधार पर वेतन देगी.
इसे मोदी सरकार के सामान्य वर्ग के ग़रीब लोगों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने के फ़ैसले से जोड़कर भी शेयर किया जा रहा है.
कुछ लोगों ने लिखा है, "एक ही विद्यालय में काम करने वाले दो अलग जाति के शिक्षकों में से एक जाति विशेष के टीचर को वेतन देने में प्राथमिकता. भले ही अल्पसंख्यक व पिछड़ी जाति के शिक्षकों को तीन माह तक वेतन न मिले."
जबकि कुछ लोगों ने फ़ेसबुक पर पोस्ट किया है कि "मोदी सरकार का फ़ैसला, जाति के आधार पर करें वेतन भुगतान. एससी/एसटी कर्मचारियों को पहले वेतन दे बिहार सरकार."
वहीं कुछ लोगों ने बिहार की स्थानीय वेबसाइटों में छपी ख़बरों का लिंक भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है.
इन्हीं में से एक वेबसाइट ने दावा किया है कि 'नई नीति के आधार पर ही शिक्षकों को अक्तूबर और नवंबर का वेतन दिया गया है और कई जातियों के शिक्षकों का वेतन अभी भी अटका हुआ है'. वेबसाइट के अनुसार 6 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने इस ख़बर को सोशल मीडिया पर शेयर किया है.
लेकिन ये सभी दावे ग़लत हैं. अपनी पड़ताल में बीबीसी ने पाया कि बिहार सरकार ने ऐसी कोई 'नई नीति' नहीं बनाई है जिसके तहत शिक्षकों को जाति के आधार पर वेतन दिया जाए.
बिहार की शिक्षा परियोजना परिषद् के राज्य परियोजना निदेशक संजय सिंह ने बीबीसी को बताया कि बिहार सरकार ने ऐसी कोई नीति नहीं बनाई है जिसके तहत शिक्षकों को उनकी जाति के आधार पर वेतन दिया जाएगा.
उन्होंने कहा, "3 जनवरी को हमने प्रारंभिक स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों का दो महीने का बकाया वेतन उपलब्ध कराया था. वेतन की राशि हमेशा की तरह हमने दो मदों (जेनरल और एससी) में भेजी थी. लेकिन राज्य के ज़िलाधिकारियों को लिखे गए इस आधिकारिक पत्र को लोगों ने ग़लत समझा."
संजय सिंह ने बताया कि केंद्र सरकार शिक्षा से जुड़ी केंद्र प्रायोजित योजनाओं जैसे सर्व शिक्षा अभियान के लिए जो पैसा राज्य सरकार को भेजती है, उसे दो मदों (जेनरल और एससी) में ही भेजा जाता है.
संजय सिंह ने कहा कि सरकार फ़ंड में इस तरह का बंटवारा लेखांकन और ऑडिट के लिए करती है.
बिहार के राज्य प्राथमिक शिक्षा संघ के कार्यकारी अध्यक्ष मिथिलेश शर्मा ने बीबीसी को बताया कि वेतन में अनियमितता को लेकर प्राथमिक शिक्षकों की काफ़ी शिकायतें हैं. लेकिन जिस तरह से अक्तूबर और नवंबर का वेतन जनवरी में जारी किया गया और आदेश में दो मदों का ज़िक्र किया गया, इससे शिक्षकों में ये चर्चा ज़रूर उठी थी कि क्या अब सरकार जाति के आधार पर वेतन देगी.
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