''वो 10 अप्रैल 2018 का दिन था. मैं हर रोज़ की तरह कॉलेज के लिए निकला था. मैं रोज़ाना ट्रेन से कॉलेज जाता था. उस दिन भी मैं ट्रेन पर चढ़ने की कोशिश कर रहा था. तभी ट्रेन चल पड़ी और मेरा पैर फिसल गया. मैं ट्रेन और ट्रैक के बीच में फंस गया था. ट्रेन मेरे बाएं हाथ के ऊपर से गुज़री और हाथ कोहनी से कटकर अलग हो गया. लेकिन मेरा बैग ट्रेन में फंस गया और मैं साथ में घिसटता चला गया.''
मुंबई के रहने वाले चयांक कुमार उस दिन हमेशा के लिए अपना हाथ खो देते लेकिन समय पर अस्पताल पहुंचने के कारण उन्हें फिर से अपना हाथ मिल पाया. चयांक का कटा हुआ हाथ न सिर्फ़ जुड़ गया बल्कि छह महीने बाद उसमें हरकत भी होने लगी.
अपने साथ हुई दुर्घटना के बारे में चयांक बताते हैं, ''जब मैं ट्रेन से अलग हुआ तो देखा कि मेरा हाथ कट गया था और थोड़ी दूरी पर पड़ा था. मेरे हाथ से बहुत ख़ून बह रहा था और तेज़ दर्द था. मैं जैसे बेहोश होने को था. लेकिन मैंने किसी तरह अपना हाथ उठाया और प्लेटफ़ॉर्म की तरफ़ बढ़ा. मैंने एक शख़्स से मुझे ऊपर खींचने के लिए कहा. मैं किसी तरह प्लेटफ़ॉर्म पर बैठा और अपनी मां को फ़ोन करने लगा लेकिन मेरे हाथ में इतना ख़ून लगा था कि फोन तक अनलॉक नहीं हुआ. मैंने किसी और व्यक्ति की मदद से अपनी मां को फ़ोन किया.''
चयांक को ये नहीं पता था कि कटा हुआ अंग कैसे जोड़ा जा सकता है. इसमें उनकी मदद रेलवे कर्मचारियों और सरकारी अस्पताल ने की.
चयांक बताते हैं, ''जब मैं अपनी मां को फ़ोन कर रहा था तब तक स्टेशन मास्टर और जीआरपी पुलिस आ गई. मुझे स्ट्रेचर पर एक एंबुलेस में ले जाया गया और पास के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया. फिर वहां से मेरी मां मुझे कोकीलाबेन अस्पताल लेकर गईं. वहां मेरी सर्जरी की गई जो क़रीब आठ घंटे चली. बाद में मेरी तीन सर्जरी और हुईं.''
सर्जरी के तुरंत बाद चयांक का हाथ ठीक नहीं हुआ. उसमें संवेदना और हलचल महसूस होने में करीब छह महीने का वक़्त लगा.
चयांक ने बताया, ''सर्जरी के बाद हाथ में कोई हलचल नहीं थी. कुछ महसूस नहीं हो रहा था. फिज़ियोथेरेपिस्ट से भी इलाज चल रहा था. फिर सितंबर-अक्टूबर में उंगलियों में हरकत होनी शुरू हुई. अभी तो हाथ में ठंडा-गर्म का पता चलता है. किसी के छूने का पता चलता है. पूरी तरह मूवमेंट तो नहीं है पर सुधार हो रहा है. कभी-कभी तो लगता था कि पता नहीं हाथ ठीक होगा या नहीं लेकिन मेरी मां हमेशा मेरी हिम्मत बढ़ाती रहीं.''
इंजीनियरिंग कर रहे चयांक कुमार का हाथ तो बच गया लेकिन सही जानकारी न होने पर ऐसी ही दुर्घटनाओं में कई लोगों को कटा हुआ अंग वापस नहीं मिल पाता. शरीर से पूरी तरह अलग हो चुके अंग को दोबारा जोड़ा जा सकता है लेकिन उसके लिए कुछ सावधानियां ज़रूरी होती हैं.
कोकिलाबेन अंबानी अस्पताल में चयांक कुमार का इलाज करने वाले प्लास्टिक सर्जन डॉक्टर क़ाज़ी अहमद कहते हैं कि चयांक का हाथ इसलिए बच पाया क्योंकि वो समय पर और सही तरीके़ से अस्पताल पहुंच गया था. चार घंटे के अंदर ही उनकी सर्जरी हो गई थी.
डॉक्टर क़ाज़ी अहमद ने ऐसे मामले में बरती जाने वाली सावधानियों और इस ख़ास सर्जरी के बारे में विस्तार से बताया-
कैसे रखें कटा हुआ अंग
सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि कटे हुए अंग को ख़राब होने से पहले अस्पताल लाना ताकि सही समय पर सर्जरी की जा सके. जब तक वो शरीर से जुड़ा होता है तब तक रक्त प्रवाह के ज़रिए कोशिकाओं को ऑक्सीजन मिलती रहती है लेकिन कट जाने के बाद ऑक्सीजन न मिलने से कोशिकाएं मरने लगती हैं.
कोशिकाओं के निष्क्रिय होने से पहले अंग को शरीर से जोड़ना ज़रूरी है ताकि उसमें रक्त प्रवाह शुरू हो जाए. इसलिए इस बात का ध्यान देना है कि जो हिस्सा कट गया है वो थोड़ा ठंडा रहे और उसका मेटाबॉलिज्म बना रहे यानि उसमें जान रहे.
इसके लिए कटे हुए अंग को सलाइन या साफ़ पानी से धोएं. फिर एक साफ़ कपड़े में हल्का लपेट दें. कपड़े से टाइट बांधें नहीं, बस लपेटें. जैसे रुमाल या गीले तौलिये का इस्तेमाल कर सकते हैं. फिर उसे एक पॉलिथिन में डाल दें. इस पॉलिथिन को फिर एक दूसरी पॉलिथिन में डालना है जिसमें ठंडा पानी और बर्फ़ हो. इससे कटा हुआ हिस्सा ठंडा रहेगा लेकिन बर्फ़ के सीधे संपर्क में नहीं होगा.
उस कटे हुए अंग पर सीधा बर्फ़ नहीं लगनी चाहिए. बर्फ़ जम जाने से वो ख़राब हो जाएगा. उसे कोल्ड इंजरी हो सकती है. ठंडा रखने से उसका मेटाबॉलिज्म बना रहता है और निष्क्रिय होने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है. इससे सर्जरी के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है.
वहीं, जो हिस्सा शरीर से जुड़ा है उसे गीले साफ़ कपड़े से लपेट दें ताकि ख़ून बहना रुक जाए. उसमें हल्के प्रेशर की ड्रेसिंग कर दें. अगर ख़ून बहना नहीं रुका तो जान का ख़तरा हो सकता है. गुप्तांगों के कटने पर भी यही प्रक्रिया होती है.
बचाने के लिए कितना समय
कटे हुए अंग की कितने समय में सर्जरी हो जानी चाहिए, ये इस बात पर निर्भर करता है कि कौन सा अंग कटा है. जैसे उंगली कटती है तो उसे अच्छी तरह प्रीज़र्व करने पर 10 से 12 घंटे का समय भी मिल जाता है. कई बर 24 घंटे तक भी उंगली बचाई जा सकती है.
लेकिन, जितना ऊपर का अंग होता है उसे बचाने का समय भी कम होता जाता है. जैसे कि कोहनी, बांह या पूरा हाथ कट जाए तो अधिकतम समय चार घंटे तक हो सकता है. इतने समय में हाथ को जोड़ना ज़रूरी है. क्योंकि जिस अंग में जितनी ज़्यादा मांसपेशियां होंगी, उसे बचाने का समय भी कम होगा.
इस सर्जरी में सामान्य स्टीचिंग नहीं होती, बल्कि माइक्रोवैस्क्यूलर सर्जरी होती है. ये एक नस जोड़ने वाली प्रक्रिया है. इसमें बहुत बारिक नसों और नलियों को जोड़ा जाता है. ये सर्जरी ऑपरेटिंग माइक्रोस्पोक में होती है और इसमें बाल से भी पतले धागों से सिलाई की जाती है ताकि रक्त प्रवाह फिर से शुरू हो सके.
ये टांके सामान्य घाव पर लगने वाले धागे से नहीं लगाए जा सकते और न ही इन्हें खोला जाता है. ये शरीर में ही रहकर जोड़ी गईं मांसपेशियों को सहयोग देते हैं. ये सर्जरी वो प्लास्टिक सर्जन ही कर सकते हैं जिनके पास माइक्रोवेस्क्यूलर सर्जरी की विशेषज्ञता हो.
कटे हुए अंग को ठीक होने में कितना समय लगेगा ये इस बात पर निर्भर करता है कि चोट कितनी बड़ी है. जितनी बड़ी चोट होती है उसे ठीक होने में भी उतना ही समय लगता है. आगे का रास्ता भी थोड़ा मुश्किल होता है लेकिन धीरे-धीरे रिकवरी हो जाती है. बाद में भी छोटी-मोटी सर्जरी की ज़रूरत पड़ सकती है.
जुड़ने के बाद शरीर का वो हिस्सा निष्क्रिय लगता है और उसमें हरकत आने में 4 से 6 महीने का समय लग जाता है. अगर सर्जरी अच्छी तरह की गई हो तो आमतौर पर अंग में सेंसेशन आ जाता है. बीच-बीच में सेंसेशन कम-ज़्यादा होता रहता है. इस इलाज में ऑर्थोपेडिक डॉक्टर और फिजियोथेरेपिस्ट की भी ज़रूरत होती है.
Monday, April 22, 2019
Tuesday, April 16, 2019
सांसद का बेटा दुकानदार, मुख्यमंत्री के परिजन मजदूर और ये बिलकुल सच है: लोकसभा चुनाव 2019
रोजाना सुबह 72 साल के देवनाथ सेन ऑटो से पूर्णिया बस स्टैंड के पास मौजूद विकास बाजार जाते है और अपनी दुकान खोलकर दुकानदारी शुरू कर देते है. ये उनका रोजाना का काम है.
देखने में ये बात बहुत सामान्य-सी लगती है लेकिन दुकानदार देवनाथ सेन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं. वो चार बार सांसद रहे फनी गोपाल सेन गुप्ता के बेटे हैं.
फनी गोपाल सेनगुप्ता 1952 से 1967 के बीच पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र के लिए हुए चार आम चुनावों में जीत कर सांसद बने थे.
देवनाथ सेन बताते है, "पिताजी से जब कभी संपत्ति के बारे में बात की तो वो कहते थे - तुम खुद कमा के बना लेना, बहुत आनंद आएगा. यही सोचना कि तुम्हारे बाप ने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया. तब से ये बात दिलोदिमाग में बैठ गई कि ईमानदारी की रोटी खाएगें. "
फनी गोपाल सेनगुप्ता का खानदानी पेशा कविराज यानी वैद्द का था. ललित मोहन सेन गुप्ता का ये परिवार बांग्लादेश से 1890 में पूर्णिया आकर बस गया था.
ललित मोहन के तीन बेटे थे. सबसे बड़ा बेटा शिक्षक, फिर फनी गोपाल सेनगुप्ता और सबसे छोटा बेटा कविराज यानी वैद्द. चूंकि सबसे छोटे बेटे की मृत्यु कम उम्र में ही हो गई, इसलिए खानदानी पेशे को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं था.
पूर्णिया जिले की स्थापना के 250 साल पूरे होने पर प्रशासन द्वारा छापी पत्रिका 'वल्लरी' के मुताबिक़ फनी गोपाल सेनगुप्ता का जन्म 1905 में पूर्णिया शहर में हुआ.
मुख्य तौर पर ड्राइ फ्रूट की दुकान चला रहे देववाथ बताते है, "1929 में वो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में जुड़े जिसके बाद वो 1929, 1932, 1940, 1944 में जेल गए. 1933 में उनकी शादी हो गई लेकिन वो ज्यादातर जेल में रहते थे. तो मेरी नानी कहती थी कि मैने अपनी बेटी के गले में कलसी बांध कर पानी में डुबो दिया है."
पूर्णिया और भागलपुर से अपनी पढाई करने वाले फनी गोपाल सेनगुप्ता को बांग्ला, हिन्दी, उर्दु, अंग्रेजी भाषा पर अधिकार था.
परिवार के पास फनी गोपाल के जो कागज़ात हैं उनमें अंग्रेजी दैनिक अखबार 'द सर्चलाइट' का भी एक पत्र है. इस पत्र में संपादक सुभाष चन्द्र सरकार ने फनी गोपाल सेनगुप्ता को टैगोर की कविताओं के हिन्दी अनुवाद के लिए धन्यवाद दिया है.
पत्र में लिखा है कि ये कविताएं संपादक प्रदीप के संपादक को भेज रहे है.
परिवार के पास मौजूद दस्तावेज़ों में फनी गोपाल सेनगुप्ता की डायरी है जिसमें वो रोजाना की गतिविधियां बेहद महीन अक्षरों में अंग्रेजी में लिखते थे. इसके अलावा पार्लियामेंट लिखे नोटपैड के पन्ने है जिसमें उनका संसद सत्र के दौरान हुआ खर्च लिखा है.
देवनाथ सेन बताते है, "उस वक्त जब सत्र चलता था तब 40 रूपये रोज़ाना मिलता था. सासंद लॉज में रहते थे और दिल्ली आना-जाना भी अपने पैसे पर करना पड़ता था."
"पिताजी थर्ड क्लास में सफर करते थे और यहां क्षेत्र में साइकिल से ही घूमते थे. क्योंकि पैसे थे नहीं."
खुद देवनाथ सेन की पढ़ाई आर्थिक तंगी के चलते छूट गई.
देनवाथ सेन बताते है, "हम 3 भाई और 2 बहन थे. पिताजी सांसद थे लेकिन परिवार में बहुत आर्थिक तंगी थी. मैने पूर्णिया कालेज में दाखिला लिया था लेकिन बीए नहीं कर पाया और 1971 में मैंने ये दुकान खोल ली. हालांकि बहन शतोदल और मृदुला सेन में से छोटी बहन मृदुला को पोस्ट ग्रेजुएशन कराया."
देवनाथ कहते है, "हमारे पिता ने जीवन बहुत ईमानदारी से जिया. वो चार बार सांसद रहे लेकिन हम लोगों को कभी दिल्ली नहीं ले कर गए. बस एक बार पूरा परिवार दिल्ली घूमने गया था."
मुख्यमंत्री के पोते कर रहे हैं मज़दूरी
पूर्णिया शहर में स्थित इस दुकान से कुछ दूर ही मजदूरों की मंडी लगती है. काम के इंतजार में खड़े मजदूरों में बसंत और कपिल पासवान भी है.
ये दोनों ही बिहार के तीन बार और पहले दलित मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री के पोते है.
रोजाना पूर्णिया के केनगर प्रखंड के बैरगाछी से ये लोग काम की तलाश में 14 किलोमीटर का फासला तय करके आते हैं. मजदूरी करते हैं और लौट जाते हैं. भोला पासवान की कोई संतान नहीं थी, उनकी जिंदगी के सहारे उनके भाइयों के बच्चे ही रहे.
वो कहते थे, "मेरी और मेरे बच्चों की पूरी जिंदगी मजदूरी करते हुए कट गई. बहुत मुश्किल से राशन कार्ड मिला है. लेकिन ये भी एक ही है जबकि बेटे तीन है. हमको तीन राशन कार्ड दिलवा दीजिए. जिंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी."
परिवार के पास अपनी कोई ज़मीन नहीं है. लेकिन परिवार का कहना है कि गांव में भोला पासवान का स्मारक बनाने के लिए तीन डेसीमिल जमीन सरकार को दे दी.
विरंची बताते है, "डी एम साहब से कहा कि आपके चचा का स्मारक बनेगा, तो हमने ज़मीन दे दी. क्या करते?"
विरंची के पोते-पोतियां बगल के ही भोला पासवान प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते है. विरंची के बेटे बसंत पासवान गुस्से से कहते है, "21 सितंबर को भोला बाबू की जयंती रहती है तो प्रशासन को हमारी याद आती है."
देखने में ये बात बहुत सामान्य-सी लगती है लेकिन दुकानदार देवनाथ सेन कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं. वो चार बार सांसद रहे फनी गोपाल सेन गुप्ता के बेटे हैं.
फनी गोपाल सेनगुप्ता 1952 से 1967 के बीच पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र के लिए हुए चार आम चुनावों में जीत कर सांसद बने थे.
देवनाथ सेन बताते है, "पिताजी से जब कभी संपत्ति के बारे में बात की तो वो कहते थे - तुम खुद कमा के बना लेना, बहुत आनंद आएगा. यही सोचना कि तुम्हारे बाप ने तुम्हारे लिए कुछ नहीं किया. तब से ये बात दिलोदिमाग में बैठ गई कि ईमानदारी की रोटी खाएगें. "
फनी गोपाल सेनगुप्ता का खानदानी पेशा कविराज यानी वैद्द का था. ललित मोहन सेन गुप्ता का ये परिवार बांग्लादेश से 1890 में पूर्णिया आकर बस गया था.
ललित मोहन के तीन बेटे थे. सबसे बड़ा बेटा शिक्षक, फिर फनी गोपाल सेनगुप्ता और सबसे छोटा बेटा कविराज यानी वैद्द. चूंकि सबसे छोटे बेटे की मृत्यु कम उम्र में ही हो गई, इसलिए खानदानी पेशे को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं था.
पूर्णिया जिले की स्थापना के 250 साल पूरे होने पर प्रशासन द्वारा छापी पत्रिका 'वल्लरी' के मुताबिक़ फनी गोपाल सेनगुप्ता का जन्म 1905 में पूर्णिया शहर में हुआ.
मुख्य तौर पर ड्राइ फ्रूट की दुकान चला रहे देववाथ बताते है, "1929 में वो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में जुड़े जिसके बाद वो 1929, 1932, 1940, 1944 में जेल गए. 1933 में उनकी शादी हो गई लेकिन वो ज्यादातर जेल में रहते थे. तो मेरी नानी कहती थी कि मैने अपनी बेटी के गले में कलसी बांध कर पानी में डुबो दिया है."
पूर्णिया और भागलपुर से अपनी पढाई करने वाले फनी गोपाल सेनगुप्ता को बांग्ला, हिन्दी, उर्दु, अंग्रेजी भाषा पर अधिकार था.
परिवार के पास फनी गोपाल के जो कागज़ात हैं उनमें अंग्रेजी दैनिक अखबार 'द सर्चलाइट' का भी एक पत्र है. इस पत्र में संपादक सुभाष चन्द्र सरकार ने फनी गोपाल सेनगुप्ता को टैगोर की कविताओं के हिन्दी अनुवाद के लिए धन्यवाद दिया है.
पत्र में लिखा है कि ये कविताएं संपादक प्रदीप के संपादक को भेज रहे है.
परिवार के पास मौजूद दस्तावेज़ों में फनी गोपाल सेनगुप्ता की डायरी है जिसमें वो रोजाना की गतिविधियां बेहद महीन अक्षरों में अंग्रेजी में लिखते थे. इसके अलावा पार्लियामेंट लिखे नोटपैड के पन्ने है जिसमें उनका संसद सत्र के दौरान हुआ खर्च लिखा है.
देवनाथ सेन बताते है, "उस वक्त जब सत्र चलता था तब 40 रूपये रोज़ाना मिलता था. सासंद लॉज में रहते थे और दिल्ली आना-जाना भी अपने पैसे पर करना पड़ता था."
"पिताजी थर्ड क्लास में सफर करते थे और यहां क्षेत्र में साइकिल से ही घूमते थे. क्योंकि पैसे थे नहीं."
खुद देवनाथ सेन की पढ़ाई आर्थिक तंगी के चलते छूट गई.
देनवाथ सेन बताते है, "हम 3 भाई और 2 बहन थे. पिताजी सांसद थे लेकिन परिवार में बहुत आर्थिक तंगी थी. मैने पूर्णिया कालेज में दाखिला लिया था लेकिन बीए नहीं कर पाया और 1971 में मैंने ये दुकान खोल ली. हालांकि बहन शतोदल और मृदुला सेन में से छोटी बहन मृदुला को पोस्ट ग्रेजुएशन कराया."
देवनाथ कहते है, "हमारे पिता ने जीवन बहुत ईमानदारी से जिया. वो चार बार सांसद रहे लेकिन हम लोगों को कभी दिल्ली नहीं ले कर गए. बस एक बार पूरा परिवार दिल्ली घूमने गया था."
मुख्यमंत्री के पोते कर रहे हैं मज़दूरी
पूर्णिया शहर में स्थित इस दुकान से कुछ दूर ही मजदूरों की मंडी लगती है. काम के इंतजार में खड़े मजदूरों में बसंत और कपिल पासवान भी है.
ये दोनों ही बिहार के तीन बार और पहले दलित मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री के पोते है.
रोजाना पूर्णिया के केनगर प्रखंड के बैरगाछी से ये लोग काम की तलाश में 14 किलोमीटर का फासला तय करके आते हैं. मजदूरी करते हैं और लौट जाते हैं. भोला पासवान की कोई संतान नहीं थी, उनकी जिंदगी के सहारे उनके भाइयों के बच्चे ही रहे.
वो कहते थे, "मेरी और मेरे बच्चों की पूरी जिंदगी मजदूरी करते हुए कट गई. बहुत मुश्किल से राशन कार्ड मिला है. लेकिन ये भी एक ही है जबकि बेटे तीन है. हमको तीन राशन कार्ड दिलवा दीजिए. जिंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी."
परिवार के पास अपनी कोई ज़मीन नहीं है. लेकिन परिवार का कहना है कि गांव में भोला पासवान का स्मारक बनाने के लिए तीन डेसीमिल जमीन सरकार को दे दी.
विरंची बताते है, "डी एम साहब से कहा कि आपके चचा का स्मारक बनेगा, तो हमने ज़मीन दे दी. क्या करते?"
विरंची के पोते-पोतियां बगल के ही भोला पासवान प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते है. विरंची के बेटे बसंत पासवान गुस्से से कहते है, "21 सितंबर को भोला बाबू की जयंती रहती है तो प्रशासन को हमारी याद आती है."
Tuesday, April 9, 2019
वायनाड से चुनाव लड़ना राहुल गांधी का दक्षिण भारत में मास्टर स्ट्रोक: नज़रिया
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अमेठी के साथ साथ उत्तरी केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ रहे हैं. उनके यहां से चुनाव लड़ने पर उम्मीद के मुताबिक ही काफी प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं.
बीजेपी यह यह कह रही है कि वे हिंदू मतदाताओं से भाग रहे हैं हालांकि 2011 की जनगणना के मुताबिक अमेठी में मुस्लिम आबादी 33.04 फीसदी है, जबकि वायनाड में 28.65 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
वहीं वामपंथी दल ये मान रहे हैं कि राहुल गांधी उन्हें चुनौती दे रहे हैं जबकि दस साल पहले बनी इस संसदीय सीट पर कांग्रेस ने अब तक हुए दोनों चुनाव में सीपीआई को हराया है. हालांकि 2014 में कांग्रेस की जीत का अंतर बेहद कम रह गया था.
वहीं कांग्रेस को भरोसा है कि वायनाड से राहुल गांधी के चुनाव लड़ने से केरल के अलावा तमिलनाडु और कर्नाटक की सीटों पर भी साकारात्मक असर होगा.
कांग्रेस के तर्क को आत्म संतुष्टि वाला आकलन कह सकते हैं. क्योंकि वायनाड की सात विधानसभा सीटों में से चार सीटों पर सीपीएम और सीपीएम समर्थित एक निर्दलीय का कब्जा है.
वहीं तमिलनाडु की थानी सीट से एआईएडीएमके ने उप-मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वन के बेटे को उम्मीदवार बनाया है जिनका मुकाबला कांग्रेस के उम्मीदवार ईवीकेएस इलनगोवान है. इलनगोवान पेरियार के पोते हैं.
कर्नाटक के चमराजनगर में कांग्रेस के ध्रुव नारायण मौजूदा सांसद हैं, उन्हें 16वीं लोकसभा के सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले सांसदों में शामिल हैं, वो भी तब जब राहुल गांधी बगल वाली सीट से चुनाव नहीं लड़े थे.
ऐतिहासिक तौर पर, गांधी परिवार रायसीना की सत्ता को हासिल करने के लिए दक्षिण में नीचे का रास्ता पकड़ती रही है.
आपातकाल में हार के बाद, इंदिरा गांधी ने संसद में वापसी के लिए 1978 में चिकमंगलूर का रास्ता चुना था, साथ में 1980 में इंदिरा गांधी मेढ़क से चुनाव जीतने में कामयाब रही. 1999 में, उनकी पुत्रवधू सोनिया गांधी ने बेल्लारी से अपनी शुरुआत की थी.
अपनी दादी और मां की तरह, राहुल गांधी ने दक्षिण भारत से चुनाव लड़ने का सुरक्षित रास्ता अपनाया है.
पुलवामा हमले के बाद 'डेली थांती' में एक सर्वे छपा था, जिसमें यह दिखा था कि राहुल गांधी की लोकप्रियता बीते एक महीने में बढ़ी थी जो 41 फीसदी थी, जबकि मोदी की लोकप्रियता 26 फीसदी थी.
एक अन्य सर्वे इंडिया टुडे में प्रकाशित हुआ था, जिसके मुताबिक केरल के 64 फीसदी लोग राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं जबकि मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखने वाले लोगों की आबादी 22 फीसदी है.
लेकिन 2019 में कांग्रेस की कहानी में कई और पेंच भी हैं. कर्नाटक अब उतना सुरक्षित नहीं रह गया है, जबकि आंध्र प्रदेश, अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, दो राज्यों में बंट चुका है और तमिलनाडु किसी बाहरी के लिए अभी भी अनुकूल नहीं रह गया है.
पिछले सप्ताह नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद राहुल गांधी ने कहा, "दक्षिण भारत के लोगों को अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास, को लेकर आरएसएस, बीजेपी और नरेंद्र मोदी से ख़तरा महसूस हो रहा है. मैं दक्षिण भारत के लोगों को बताना चाहता हूं कि मैं उनके साथ खड़ा हूं. कांग्रेस पार्टी उनके साथ खड़ी है."
इसके बाद से कई कांग्रेसी नेताओं ने बताया कि राहुल गांधी की वायनाड से उम्मीदवारी, मोदी सरकार के दक्षिण भारत की उपेक्षा का जवाब है.
कांग्रेसी सांसद शशि थरूर ने द प्रिंट में लिखा है, "केंद्र में बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौर में दक्षिण भारतीय राज्यों और केंद्र सरकार के आपसी संबंध ख़राब हुए हैं. "
वहीं कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरेजवाला ने कहा, "राहुल गांधी उत्तर और दक्षिण भारत के आपसी रिश्तों को मजबूत करेंगे."
दूसरे शब्दों में, जब नरेंद्र मोदी और बीजेपी राष्ट्रवादी राष्ट्रवाद का पैरोकार कर रही है जिसमें मजबूत नेता, मजबूत सीमा और सुरक्षित राष्ट्र की बात कही जा रही है. इसके जवाब में कांग्रेस दक्षिण भारत की क्षेत्रीय अस्मिता को मज़बूत करके वैकल्पिक राष्ट्रवाद के नैरेटिव को बढ़ा रही है.
कांग्रेस की रणनीति का दमखम
वैसे आंकड़ों में कांग्रेस की इस रणनीति में दम दिख रहा है.
मोदी लहर पर सवार होने के बाद भी 2014 के चुनाव में बीजेपी को पांच दक्षिण भारतीय राज्यों की 112 सीटों में 20 सीटें हासिल हुई थीं. जिसमें 17 समुद्रतटीय और उत्तरी कनार्टक में हासिल हुए थे. बीजेपी ने इन राज्यों की 67 सीटों पर चुनाव लड़ा था. जहां देश भर में बीजेपी की स्ट्राइक रेट 60 फीसदी थी वहीं दक्षिण भारतीय राज्यों में ये महज 19 फ़ीसदी था.
बीजेपी की सरकार ने बीते पांच सालों में आपसी तालमेल वाले संघीय ढांचे की बात जोर शोर से भले उठायी हो लेकिन उसने दक्षिण भारत को कांग्रेस, वामपंथी दलों और क्षेत्रीय दलों के लिए खुला छोड़ दिया है.
मोदी सरकार ने आंध्र प्रदेश के लिए स्पेशल पैकेज की घोषणा करने के बाद कदम पीछे खींच लिए, जिसके चलते तेलगूदेशम एनडीए से अलग हो गई.
संयुक्त अरब अमीरात ने केरल को बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए 700 करोड़ रुपये मदद देने की घोषणा की थी लेकिन इसे केंद्र सरकार ने रोक दिया था.
तमिलनाडु में साइक्लोन गांजा से बेघर लोगों को मदद पहुंचाने में नाकाम रही, जिसके बाद गोबैक मोदी ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा था.
केंद्र सरकार ने सूखा से प्रभावित कर्नाटक के लिए केवल 950 करोड़ रुपये जारी किए जबकि आधिकारिक प्रावधानों के तहत 4,500 करोड़ रुपये दिए जाने थे. इतना ही नहीं मनरेगा के अधीन 70 फीसदी फंड को जारी नहीं किया गया.
इस बात पर लोगों को अचरज हुआ जब 15वीं वित्त आयोग ने 2011 के जनगणना के आंकड़ों का आधार किया है, जबकि 14वीं वित्त आयोगम 1971 के आंकड़े लिए गए थे. इस वजह से कहीं ज्यादा शिक्षित दक्षिण भारतीय राज्यों को बेहतर परिवार नियोजन और कम आबादी के चलते कम अनुदान भी मिला.
बीजेपी इन सवालों के जवाब को पैसों के आवंटन से जोड़ती रही है. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कहते रहे हैं कि जबसे एनडीए की सरकार बनी है तबसे दक्षिण भारतीय राज्यों को कहीं ज्यादा पैसा मिला है. हालांकि वे ऐसा कहते वक्त ये भूल जाते हैं कि दक्षिण भारतीय राज्य राष्ट्रीय राजस्व में कितना योगदान देते हैं. कर्नाटक और तमिलनाडु देश के आयकर जुटाने वाले देश के शीर्ष चार राज्यों में शामिल हैं.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज के प्रोफेसर नरेंद्र पानी कहते हैं, "15वीं वित्त आयोग उत्तर ङाकच तो ज्यादा तरजीह दी गई क्योंकि वहां आबादी बहुत ज्यादा है. इसलिए भी दिल्ली की उपेक्षा के बाद भी दक्षिण भारतीय राज्यों के बेहतर करने की सोच को बढ़ावा मिला."
दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ भेदभाव
इसके अलावा दक्षिण भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी कई बार अहम मुद्दों पर बातचीत के लिए प्रधानमंत्री से समय नहीं मिलने की शिकायत की. इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल और लेफ्टिनेंट गवर्नर भी केंद्र सरकार के इशारों पर काम कर रहे होते हैं.
इसके अलावा अलग अलग राज्यों के अपने मसले भी रहे हैं. तमिलनाडु में एनईईटी, जलीकट्टू और स्टारलाइट, केरल में सबरीमला मंदिर में प्रवेश और कथित तौर पर आरएसएस कार्यकर्ता की हत्याएं, गोवा, कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच मांडवी और कावेरी नदी के पानी का बंटवारे के मुद्दों से बीजेपी के एंटी साउथ सेंटीमेंट को ही बढ़ावा दिया है.
बीजेपी यह यह कह रही है कि वे हिंदू मतदाताओं से भाग रहे हैं हालांकि 2011 की जनगणना के मुताबिक अमेठी में मुस्लिम आबादी 33.04 फीसदी है, जबकि वायनाड में 28.65 फ़ीसदी मुसलमान हैं.
वहीं वामपंथी दल ये मान रहे हैं कि राहुल गांधी उन्हें चुनौती दे रहे हैं जबकि दस साल पहले बनी इस संसदीय सीट पर कांग्रेस ने अब तक हुए दोनों चुनाव में सीपीआई को हराया है. हालांकि 2014 में कांग्रेस की जीत का अंतर बेहद कम रह गया था.
वहीं कांग्रेस को भरोसा है कि वायनाड से राहुल गांधी के चुनाव लड़ने से केरल के अलावा तमिलनाडु और कर्नाटक की सीटों पर भी साकारात्मक असर होगा.
कांग्रेस के तर्क को आत्म संतुष्टि वाला आकलन कह सकते हैं. क्योंकि वायनाड की सात विधानसभा सीटों में से चार सीटों पर सीपीएम और सीपीएम समर्थित एक निर्दलीय का कब्जा है.
वहीं तमिलनाडु की थानी सीट से एआईएडीएमके ने उप-मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वन के बेटे को उम्मीदवार बनाया है जिनका मुकाबला कांग्रेस के उम्मीदवार ईवीकेएस इलनगोवान है. इलनगोवान पेरियार के पोते हैं.
कर्नाटक के चमराजनगर में कांग्रेस के ध्रुव नारायण मौजूदा सांसद हैं, उन्हें 16वीं लोकसभा के सबसे बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले सांसदों में शामिल हैं, वो भी तब जब राहुल गांधी बगल वाली सीट से चुनाव नहीं लड़े थे.
ऐतिहासिक तौर पर, गांधी परिवार रायसीना की सत्ता को हासिल करने के लिए दक्षिण में नीचे का रास्ता पकड़ती रही है.
आपातकाल में हार के बाद, इंदिरा गांधी ने संसद में वापसी के लिए 1978 में चिकमंगलूर का रास्ता चुना था, साथ में 1980 में इंदिरा गांधी मेढ़क से चुनाव जीतने में कामयाब रही. 1999 में, उनकी पुत्रवधू सोनिया गांधी ने बेल्लारी से अपनी शुरुआत की थी.
अपनी दादी और मां की तरह, राहुल गांधी ने दक्षिण भारत से चुनाव लड़ने का सुरक्षित रास्ता अपनाया है.
पुलवामा हमले के बाद 'डेली थांती' में एक सर्वे छपा था, जिसमें यह दिखा था कि राहुल गांधी की लोकप्रियता बीते एक महीने में बढ़ी थी जो 41 फीसदी थी, जबकि मोदी की लोकप्रियता 26 फीसदी थी.
एक अन्य सर्वे इंडिया टुडे में प्रकाशित हुआ था, जिसके मुताबिक केरल के 64 फीसदी लोग राहुल गांधी को अगले प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं जबकि मोदी को प्रधानमंत्री के तौर पर देखने वाले लोगों की आबादी 22 फीसदी है.
लेकिन 2019 में कांग्रेस की कहानी में कई और पेंच भी हैं. कर्नाटक अब उतना सुरक्षित नहीं रह गया है, जबकि आंध्र प्रदेश, अब आंध्र प्रदेश और तेलंगाना, दो राज्यों में बंट चुका है और तमिलनाडु किसी बाहरी के लिए अभी भी अनुकूल नहीं रह गया है.
पिछले सप्ताह नामांकन पत्र दाखिल करने के बाद राहुल गांधी ने कहा, "दक्षिण भारत के लोगों को अपनी भाषा, संस्कृति और इतिहास, को लेकर आरएसएस, बीजेपी और नरेंद्र मोदी से ख़तरा महसूस हो रहा है. मैं दक्षिण भारत के लोगों को बताना चाहता हूं कि मैं उनके साथ खड़ा हूं. कांग्रेस पार्टी उनके साथ खड़ी है."
इसके बाद से कई कांग्रेसी नेताओं ने बताया कि राहुल गांधी की वायनाड से उम्मीदवारी, मोदी सरकार के दक्षिण भारत की उपेक्षा का जवाब है.
कांग्रेसी सांसद शशि थरूर ने द प्रिंट में लिखा है, "केंद्र में बीजेपी नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के दौर में दक्षिण भारतीय राज्यों और केंद्र सरकार के आपसी संबंध ख़राब हुए हैं. "
वहीं कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता रणदीप सुरेजवाला ने कहा, "राहुल गांधी उत्तर और दक्षिण भारत के आपसी रिश्तों को मजबूत करेंगे."
दूसरे शब्दों में, जब नरेंद्र मोदी और बीजेपी राष्ट्रवादी राष्ट्रवाद का पैरोकार कर रही है जिसमें मजबूत नेता, मजबूत सीमा और सुरक्षित राष्ट्र की बात कही जा रही है. इसके जवाब में कांग्रेस दक्षिण भारत की क्षेत्रीय अस्मिता को मज़बूत करके वैकल्पिक राष्ट्रवाद के नैरेटिव को बढ़ा रही है.
कांग्रेस की रणनीति का दमखम
वैसे आंकड़ों में कांग्रेस की इस रणनीति में दम दिख रहा है.
मोदी लहर पर सवार होने के बाद भी 2014 के चुनाव में बीजेपी को पांच दक्षिण भारतीय राज्यों की 112 सीटों में 20 सीटें हासिल हुई थीं. जिसमें 17 समुद्रतटीय और उत्तरी कनार्टक में हासिल हुए थे. बीजेपी ने इन राज्यों की 67 सीटों पर चुनाव लड़ा था. जहां देश भर में बीजेपी की स्ट्राइक रेट 60 फीसदी थी वहीं दक्षिण भारतीय राज्यों में ये महज 19 फ़ीसदी था.
बीजेपी की सरकार ने बीते पांच सालों में आपसी तालमेल वाले संघीय ढांचे की बात जोर शोर से भले उठायी हो लेकिन उसने दक्षिण भारत को कांग्रेस, वामपंथी दलों और क्षेत्रीय दलों के लिए खुला छोड़ दिया है.
मोदी सरकार ने आंध्र प्रदेश के लिए स्पेशल पैकेज की घोषणा करने के बाद कदम पीछे खींच लिए, जिसके चलते तेलगूदेशम एनडीए से अलग हो गई.
संयुक्त अरब अमीरात ने केरल को बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए 700 करोड़ रुपये मदद देने की घोषणा की थी लेकिन इसे केंद्र सरकार ने रोक दिया था.
तमिलनाडु में साइक्लोन गांजा से बेघर लोगों को मदद पहुंचाने में नाकाम रही, जिसके बाद गोबैक मोदी ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा था.
केंद्र सरकार ने सूखा से प्रभावित कर्नाटक के लिए केवल 950 करोड़ रुपये जारी किए जबकि आधिकारिक प्रावधानों के तहत 4,500 करोड़ रुपये दिए जाने थे. इतना ही नहीं मनरेगा के अधीन 70 फीसदी फंड को जारी नहीं किया गया.
इस बात पर लोगों को अचरज हुआ जब 15वीं वित्त आयोग ने 2011 के जनगणना के आंकड़ों का आधार किया है, जबकि 14वीं वित्त आयोगम 1971 के आंकड़े लिए गए थे. इस वजह से कहीं ज्यादा शिक्षित दक्षिण भारतीय राज्यों को बेहतर परिवार नियोजन और कम आबादी के चलते कम अनुदान भी मिला.
बीजेपी इन सवालों के जवाब को पैसों के आवंटन से जोड़ती रही है. पार्टी अध्यक्ष अमित शाह कहते रहे हैं कि जबसे एनडीए की सरकार बनी है तबसे दक्षिण भारतीय राज्यों को कहीं ज्यादा पैसा मिला है. हालांकि वे ऐसा कहते वक्त ये भूल जाते हैं कि दक्षिण भारतीय राज्य राष्ट्रीय राजस्व में कितना योगदान देते हैं. कर्नाटक और तमिलनाडु देश के आयकर जुटाने वाले देश के शीर्ष चार राज्यों में शामिल हैं.
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज के प्रोफेसर नरेंद्र पानी कहते हैं, "15वीं वित्त आयोग उत्तर ङाकच तो ज्यादा तरजीह दी गई क्योंकि वहां आबादी बहुत ज्यादा है. इसलिए भी दिल्ली की उपेक्षा के बाद भी दक्षिण भारतीय राज्यों के बेहतर करने की सोच को बढ़ावा मिला."
दक्षिण भारतीय राज्यों के साथ भेदभाव
इसके अलावा दक्षिण भारतीय राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने भी कई बार अहम मुद्दों पर बातचीत के लिए प्रधानमंत्री से समय नहीं मिलने की शिकायत की. इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त राज्यपाल और लेफ्टिनेंट गवर्नर भी केंद्र सरकार के इशारों पर काम कर रहे होते हैं.
इसके अलावा अलग अलग राज्यों के अपने मसले भी रहे हैं. तमिलनाडु में एनईईटी, जलीकट्टू और स्टारलाइट, केरल में सबरीमला मंदिर में प्रवेश और कथित तौर पर आरएसएस कार्यकर्ता की हत्याएं, गोवा, कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच मांडवी और कावेरी नदी के पानी का बंटवारे के मुद्दों से बीजेपी के एंटी साउथ सेंटीमेंट को ही बढ़ावा दिया है.
Monday, April 1, 2019
लोकसभा चुनाव 2019: भारत के इस गांव में सबसे आख़िर में बिजली पहुंची लेकिन अब भी अंधेरे में
देश इस समय पूरी तरह चुनावी मोड में पहुंच चुका है, राजनेता देश की लंबाई और चौड़ाई नापते हुए रैलियों को संबोधित कर रहे हैं.
चुनाव प्रचार शोर से साराबोर है लेकिन इसमें करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर कम ही बात होती है.
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर का छोटा सा गांव लीसांग पिछले साल दुनियाभर में चर्चा में आ गया था. वह 'भारत का आख़िरी गांव था जहां बिजली पहुंची थी.'
दशकों से राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी घोषणापत्रों में बिजली के साथ-साथ सड़क और पानी का वादा करती रही हैं.
अप्रैल 2018 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि 'लीसांग में अब बिजली पहुंच चुकी है और वह सशक्त हो गया है' तब यह समझा गया कि सरकार तीन मुख्य मुद्दों में से कम से कम एक पर ध्यान दे रही है.
लेकिन जब मैं बीते सप्ताह वहां पहुंची तो देखा कि बिजली की आपूर्ति अनियमित थी और गांव के लोगों के पास न तो 'बिजली' थी और न ही वह 'सशक्त' दिखे.
13 परिवार का गांव
राजधानी इम्फ़ाल से 80 किलोमीटर दूर इस गांव में कुकी हिल जनजाति के 13 परिवार हैं जिनमें तकरीबन 70 सदस्य हैं.
लेकिन यहां पहुंचना इतना आसान नहीं है. सबसे नज़दीकी शहर कांगपोकपी है जिसके हाइवे का 35 किलोमीटर का हिस्सा बेहद जर्जर है. आख़िरी तीन किलोमीटर पथरीला रास्ता है जिस पर मोटरसाइकिल से या पैदल ही जाया जा सकता है. बरसात में यह गांव लगभग बाकी दुनिया से कट जाता है और रास्ता पानी से भर जाता है.
लीसांग में कोई स्कूल या स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. हालांकि, यहां के निवासियों के पास मतदाता पहचान पत्र हैं लेकिन कोई भी राजनीतिक बदलाव लाने के लिए वे बेहद कम हैं.
गांव के मुखिया टोंगसाट हाओकिप कहते हैं कि अन्य पड़ोसी गांवों में 2017 में बिजली आ गई थी लेकिन जब उन्होंने इसके बारे में पूछताछ की तो उन्हें बताया कि वे 'योजना में नहीं हैं.'
वह कहते हैं, "किसी ने हमें कोई कारण नहीं बताया तो हमने कांगपोकपी के एक बड़े बिलजी विभाग के अधिकारी से बातचीत की. उन्होंने हमसे कहा कि आप अगले साल हमारी सूची में शीर्ष पर हैं. आप संयम रखिए."
पिछले साल अप्रैल में गांवों में अचानक चहल-पहल बढ़ गई. पहले कुछ अधिकारी यहां जांच के लिए आए और फिर अगले दो सप्ताह में खंभे, तार, ट्रांसफ़ॉर्मर और दूसरे बिजली के सामान आने लगे. आख़िरकार गांव के लोगों को बताया गया कि वे 27 अप्रैल को शाम 5-6 बजे तक 'ग्रिड से कनेक्ट' हो जाएंगे.
लेमनिथन लोटजेम उन 20 से 30 लोगों के समूह में शामिल थीं जो इस मौक़े पर गांव के मुखिया के घर पर इकट्ठा हुए थे. वहां चाय बनाई गई थी और स्विच ऑन करके सब की निगाहें बल्ब की ओर टिकी हुई थीं.
लोटजेम बल्ब के बिलकुल नीचे थीं जब वह जल उठा. वह कहती हैं कि उस रात गांव में कोई नहीं सोया. पूरा गांव एक घर में जुटा जहां पर एक टीवी था जिसे पूरी रात देखा गया.
नेहकाम डाउंगुल कहते हैं कि यह फिर से पैदा होने जैसा था. कुछ दिनों के बाद कई परिवारों ने टीवी ख़रीदे और बहुत सी महिलाएं वॉशिंग मशीन और राइस कूकर ख़रीदने के ख़्वाब भी देखने लगीं.
उस दिन के बाद से अब एक साल होने को हैं और गांववालों ने मुझे बताया कि अच्छे दिनों में उन्हें पांच से छह घंटे तक बिजली मिलती है.
एक छोटी सी गड़बड़ी को ठीक होने में भी कम से कम तीन दिन लगते हैं. पिछले साल तो एक बार लीसांग तीन महीने तक अंधेरे में डूबा रहा.
मणिपुर में बिजली विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी एच शांतिकुमार सिंह ने माना कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह ठीक करने वहां जा ही नहीं पाए.
वो कहते हैं, "इस दूर दराज़ के इलाक़े में पहुंचना बहुत मुश्किल है, खासकर भूस्खलन के समय."
लेकिन उन्होंने इस बात से इनकार किया कि गांव को केवल छह घंटे ही बिजली मिलती है. उनका कहना है कि राज्य में सभी को पर्याप्त बिजली की आपूर्ति होती है.
हालांकि जिस दिन मैं गई, गांव में बिजली नहीं थी. एक घंटे बाद बिजली आई लेकिन 15 मिनट में फिर चली गई.
आठ बजे से चार बजे तक खेतों में काम करने वाली लाटजेम कहती हैं कि जब शाम को बिजली होती है तो घर के काम निबटाती हैं और टीवी देखती हैं.
डोउंगल कहते हैं कि बारिश और तेज़ हवा में हमेशा बिजली कटती है और अब तो गांव वाले मज़ाक करते हैं कि 'अगर किसी बिजली के खंभे पर कुत्ता पेशाब कर दे तो भी बिजली चली जाती है.'
प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त 2015 में घोषणा की थी कि 1000 दिनों के अंदर हरेक गांव को बिजली पहुंच जाएगी. इसी के तहत लीसांग में बिजली आई.
दिल्ली के काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरोन्मेंट एंड वॉटर से जुड़े अभिषेक जैन कहते हैं कि 2014 में जब मोदी आए तो उससे पहले ही भारत के क़रीब छह लाख गांवों में 97.5 प्रतिशत में बिजली पहुंच चुकी थी.
चुनाव प्रचार शोर से साराबोर है लेकिन इसमें करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर कम ही बात होती है.
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर का छोटा सा गांव लीसांग पिछले साल दुनियाभर में चर्चा में आ गया था. वह 'भारत का आख़िरी गांव था जहां बिजली पहुंची थी.'
दशकों से राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी घोषणापत्रों में बिजली के साथ-साथ सड़क और पानी का वादा करती रही हैं.
अप्रैल 2018 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि 'लीसांग में अब बिजली पहुंच चुकी है और वह सशक्त हो गया है' तब यह समझा गया कि सरकार तीन मुख्य मुद्दों में से कम से कम एक पर ध्यान दे रही है.
लेकिन जब मैं बीते सप्ताह वहां पहुंची तो देखा कि बिजली की आपूर्ति अनियमित थी और गांव के लोगों के पास न तो 'बिजली' थी और न ही वह 'सशक्त' दिखे.
13 परिवार का गांव
राजधानी इम्फ़ाल से 80 किलोमीटर दूर इस गांव में कुकी हिल जनजाति के 13 परिवार हैं जिनमें तकरीबन 70 सदस्य हैं.
लेकिन यहां पहुंचना इतना आसान नहीं है. सबसे नज़दीकी शहर कांगपोकपी है जिसके हाइवे का 35 किलोमीटर का हिस्सा बेहद जर्जर है. आख़िरी तीन किलोमीटर पथरीला रास्ता है जिस पर मोटरसाइकिल से या पैदल ही जाया जा सकता है. बरसात में यह गांव लगभग बाकी दुनिया से कट जाता है और रास्ता पानी से भर जाता है.
लीसांग में कोई स्कूल या स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. हालांकि, यहां के निवासियों के पास मतदाता पहचान पत्र हैं लेकिन कोई भी राजनीतिक बदलाव लाने के लिए वे बेहद कम हैं.
गांव के मुखिया टोंगसाट हाओकिप कहते हैं कि अन्य पड़ोसी गांवों में 2017 में बिजली आ गई थी लेकिन जब उन्होंने इसके बारे में पूछताछ की तो उन्हें बताया कि वे 'योजना में नहीं हैं.'
वह कहते हैं, "किसी ने हमें कोई कारण नहीं बताया तो हमने कांगपोकपी के एक बड़े बिलजी विभाग के अधिकारी से बातचीत की. उन्होंने हमसे कहा कि आप अगले साल हमारी सूची में शीर्ष पर हैं. आप संयम रखिए."
पिछले साल अप्रैल में गांवों में अचानक चहल-पहल बढ़ गई. पहले कुछ अधिकारी यहां जांच के लिए आए और फिर अगले दो सप्ताह में खंभे, तार, ट्रांसफ़ॉर्मर और दूसरे बिजली के सामान आने लगे. आख़िरकार गांव के लोगों को बताया गया कि वे 27 अप्रैल को शाम 5-6 बजे तक 'ग्रिड से कनेक्ट' हो जाएंगे.
लेमनिथन लोटजेम उन 20 से 30 लोगों के समूह में शामिल थीं जो इस मौक़े पर गांव के मुखिया के घर पर इकट्ठा हुए थे. वहां चाय बनाई गई थी और स्विच ऑन करके सब की निगाहें बल्ब की ओर टिकी हुई थीं.
लोटजेम बल्ब के बिलकुल नीचे थीं जब वह जल उठा. वह कहती हैं कि उस रात गांव में कोई नहीं सोया. पूरा गांव एक घर में जुटा जहां पर एक टीवी था जिसे पूरी रात देखा गया.
नेहकाम डाउंगुल कहते हैं कि यह फिर से पैदा होने जैसा था. कुछ दिनों के बाद कई परिवारों ने टीवी ख़रीदे और बहुत सी महिलाएं वॉशिंग मशीन और राइस कूकर ख़रीदने के ख़्वाब भी देखने लगीं.
उस दिन के बाद से अब एक साल होने को हैं और गांववालों ने मुझे बताया कि अच्छे दिनों में उन्हें पांच से छह घंटे तक बिजली मिलती है.
एक छोटी सी गड़बड़ी को ठीक होने में भी कम से कम तीन दिन लगते हैं. पिछले साल तो एक बार लीसांग तीन महीने तक अंधेरे में डूबा रहा.
मणिपुर में बिजली विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी एच शांतिकुमार सिंह ने माना कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह ठीक करने वहां जा ही नहीं पाए.
वो कहते हैं, "इस दूर दराज़ के इलाक़े में पहुंचना बहुत मुश्किल है, खासकर भूस्खलन के समय."
लेकिन उन्होंने इस बात से इनकार किया कि गांव को केवल छह घंटे ही बिजली मिलती है. उनका कहना है कि राज्य में सभी को पर्याप्त बिजली की आपूर्ति होती है.
हालांकि जिस दिन मैं गई, गांव में बिजली नहीं थी. एक घंटे बाद बिजली आई लेकिन 15 मिनट में फिर चली गई.
आठ बजे से चार बजे तक खेतों में काम करने वाली लाटजेम कहती हैं कि जब शाम को बिजली होती है तो घर के काम निबटाती हैं और टीवी देखती हैं.
डोउंगल कहते हैं कि बारिश और तेज़ हवा में हमेशा बिजली कटती है और अब तो गांव वाले मज़ाक करते हैं कि 'अगर किसी बिजली के खंभे पर कुत्ता पेशाब कर दे तो भी बिजली चली जाती है.'
प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त 2015 में घोषणा की थी कि 1000 दिनों के अंदर हरेक गांव को बिजली पहुंच जाएगी. इसी के तहत लीसांग में बिजली आई.
दिल्ली के काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरोन्मेंट एंड वॉटर से जुड़े अभिषेक जैन कहते हैं कि 2014 में जब मोदी आए तो उससे पहले ही भारत के क़रीब छह लाख गांवों में 97.5 प्रतिशत में बिजली पहुंच चुकी थी.
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