चुनाव की तारीखों की अभी तक घोषणा नहीं हुई है लेकिन राजनीतिक दावों-प्रतिदावों का सिलसिला दिनबदिन तेज़ होता जा रहा है.
बीबीसी न्यूज़ ने ऐसे ही कुछ दावों की पड़ताल की है और इसे हमारे पाठकों के लिए रियलिटी चेक सिरीज़ के तौर पर पेश किया जा रहा है.
सोमवार, 25 फरवरी से हम हफ़्ते में पांच दिन छह भारतीय भाषाओं में विशेष रिपोर्ट प्रकाशित करने जा रहे हैं. ये रिपोर्टें हमारी अंग्रेज़ी वेबसाइट पर भी पढ़ी जा सकेंगी.
इस पड़ताल में हम आंकड़ों की मदद से सियासी पार्टियों के दावों की सच्चाई अपने पाठकों के सामने रखने जा रहे हैं.
बीते साल, सितंबर में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के निदेशक जेमी एंगस ने अपने भारतीय पाठकों से ख़ास चुनावी कवरेज के तौर पर रियलिटी चेक सिरीज़ का वादा किया था.
रियलिटी चेक प्रोजेक्ट
बीबीसी रियलिटी चेक सार्वजनिक जीवन में सक्रिय लोगों, संस्थानों के दावों की पड़ताल करती है.
रियलिटी चेक प्रोजेक्ट में ये देखा जाता है कि वे हक़ीक़त की कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं और क्या वे झूठ की बुनियाद पर खड़े हैं या फिर भरमाने वाले हैं.
जेमी एंगस ने उस वक़्त कहा था, "ये कहानियां ऐसे विषयों पर हैं जिन पर राजनीतिक पार्टियां भी एकमत नहीं है कि लोग ऐसे विषयों पर हमारी स्वतंत्र विवेचना को तरजीह देते हैं."
जेमी एंगस ने कहा हमें ऐसी ख़बरें करने के लिए तैयार रहना चाहिए और इसके लिए संसाधन भी उपलब्ध करवाए जाने चाहिए ताकि हम फ़ेक न्यूज़ से निबट सकें.
पिछले साल नवंबर में बीबीसी के बियोंड फ़ेक न्यूज़ सीज़न के बाद रियलिटी चेक सर्विस की शुरुआत होने जा रही है.
बियोंड फ़ेक न्यूज़ सीज़न में हमने फर्जी ख़बरों और डिजिटल लिट्रेसी को लेकर देश भर के स्कूल-कॉलेजों में बच्चों के बीच जाकर कार्यशालाएं आयोजित की थीं.
बीबीसी में भारतीय भाषाओं की प्रमुख रूपा झा कहती हैं, "हम ये उम्मीद करते हैं कि भारत में जिन मुद्दों को लेकर बहस चल रही है, रियलिटी चेक से हम उन्हें समझा पाएंगे और चुनावों के समय हम सूचना के सबसे भरोसेमंद स्रोत बनेंगे."
बीबीसी रियलिटी चेक सिरीज़ की रिपोर्टें भारतीयों की आजीविका और जीवन को प्रभावित करने वाले मुद्दों की पड़ताल करने वाली होंगी.
महंगाई से लेकर सुरक्षा, स्वच्छता अभियान से लेकर ट्रांसपोर्ट सुविधाओं के बुनियादी ढांचे को लेकर किए गए राजनीतिक दलों के दावों की पड़ताल में बीबीसी रियलिटी चेक सिरीज़ में आंकड़ों के सहारे समझाने की कोशिश की गई है.
Monday, February 25, 2019
Wednesday, February 20, 2019
इंदिरा गाँधी को गेंदे के फूल से चिढ़ क्यों थी- विवेचना
भारतीय राजनीति में गेंदे के फूल का अपना महत्व है. कोई भी राजनीतिक आयोजन या स्वागत समारोह गेंदे के फूल के बिना अब भी संपन्न नहीं होता.
लेकिन भारत की तीसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को गेंदे के फूल से 'एलर्जी' थी और उनके स्टाफ़ को निर्देश थे कि उनका कोई भी प्रशंसक उनके पास गेंदे के फूल ले कर न आ पाए.
बहुचर्चित किताब 'द मेरीगोल्ड स्टोरी- इंदिरा गाँधी एंड अदर्स' की लेखिका और वरिष्ठ पत्रकार कुमकुम चड्ढ़ा बताती हैं, "इंदिरा की पूरी ज़िंदगी में उनके स्टाफ़ की सबसे बड़ी जद्दोजहद होती थी कि गेंदे का फूल इंदिरा गाँधी के नज़दीक न पहुंच जाए. वजह ये थी कि उन्हें गेंदे के फूल पसंद नहीं थे."
वो कहती हैं, "अगर कोई उनके पास गेंदे का फूल ले जाने में सफल हो भी जाता था तो उनकी त्योरियाँ चढ़ जाती थीं."
"लेकिन उनका ये गुस्सा उन लोगों के लिए नहीं होता था जो उनके लिए फूल ले कर आते थे, बल्कि अपने स्टाफ़ के लिए होता था कि उनके रहते ये कैसे संभव हो सका."
विडंबना है कि जब इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद उनके पार्थिव शरीर को तीन मूर्ति भवन में लोगों के दर्शनों के लिए रखा गया तो उनके चारों तरफ़ गेंदे के ही फूल थे.
एक समय तो कुमकुम का जी भी चाहा कि वो उठ कर उन फूलों को हटा दें.
वो याद करती हैं, "अगर मेरा बस चलता तो मैं उठ कर उनके पास से गेंदे का हर फूल उठा देती. लेकिन मौक़ा इतना औपचारिक था कि मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाई."
"मैंने धवन की तरफ़ देखा, लेकिन वो भी इतने टूटे हुए थे और बदहवास थे कि उनका भी इस तरफ़ ध्यान नहीं गया. लेकिन अगर इंदिरा गाँधी जीवित होतीं और किसी और के साथ ऐसा हुआ होता वो ज़रूर उठ कर गेंदे के फूल हटवातीं."
जवाहरलाल नेहरू की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गाँधी भी रोज़ सुबह आठ बज कर बीस मिनट पर आम लोगों से मिला करती थीं. इसे उनका 'दर्शन दरबार' कहा जाता था.
हफ़्ते में कम से कम तीन बार कुमकुम चड्ढा इस 'दर्शन दरबार' में मौजूद रहा करती थीं.
कुमकुम बताती हैं कि नत्थू इंदिरा के पीछे छाता लिए खड़े रहते थे, क्योंकि उन्हें धूप से भी 'एलर्जी' थी.
वो कहती हैं, "इंदिरा इस मौके का इस्तेमाल भारत के आम लोगों से मिलने के लिए करती थीं. कभी कभी जब भीड़ अनियंत्रित हो जाती थी, तो उन लोगों को तरजीह दी जाती थी, जो दिल्ली से बाहर से आते थे."
"इस दरबार में दो तरह के लोग आते थे. एक तो वो जो सिर्फ़ इंदिरा गांधी को देखना भर चाहते थे. दूसरे वो जिन्हें छोटे मोटे काम करवाने होते थे, जैसे सरकारी अस्पताल में किसी का इलाज करवाना."
"बहुत से लोग इंदिराजी के पैर छूने की कोशिश करते थे, हाँलाकि उन्हें अपने पैर छुवाना बिल्कुल पसंद नहीं था. एक बुज़ुर्ग शख़्स रोज़ उनके लिए कच्चा नारियल ले कर आते थे. लोग तिरुपति का लड्डू भी लाते थे. उन्हीं के घर पर पहली बार मैंने तिरुपति का प्रसाद खाया था."
इंदिरा गाँधी हमेशा इस बात का ध्यान रखती थीं कि वो दिखती कैसी हैं. एक बार वो अपने एक कैबिनेट मंत्री से इस बात पर नाराज़ हो गई थीं कि उन्होंने इंदिरा गाँधी के हुस्न की तारीफ़ करने की जुर्रत की थी.
कुमकुम चड्ढा याद करती हैं, "श्रीमति गाँधी के साथ एक 'पर्सनल लाइन' पार करने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता था. मैंने उनकी उपस्थिति में लोगों को हँसते हुए भी नहीं देखा. लोग बोलते भी तभी थे, जब वो उन्हें बोलने का 'क्यू' देती थी. मध्यप्रदेश के उनके एक मंत्री ने कैबिनेट बैठक के दौरान उनके सौंदर्य की तारीफ़ कर दी थी. उन्होंने उन्हें तुरंत बाहर का रास्ता दिखाया. बाद में जब उन साहब ने उनके दर्शन दरबार में जा कर अपने किए पर अफ़सोस जताने की कोशिश की, तो इंदिरा गाँधी ने उनकी तरफ़ देखा भी नहीं."
इसी तरह उनके गुस्से का शिकार मशहूर अंग्रेज़ी लेखक डॉम मोरेस को भी बनना पड़ा था. उन्होंने इंदिरा गाँधी की जीवनी लिखी थी, 'मिसेज़ गांधी,' जिसके कुछ अंश उनको पसंद नहीं आए थे.
मशहूर प्रकाशक, पत्रकार और लेखक अशोक चोपड़ा एक किस्सा सुनाते हैं, "एक बार मैं इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी के दफ़्तर में बैठा हुआ था. तभी मैने देखा कि बहहवास से डॉम मोरेस कमरे में घुसे. ऐसा लग रहा था कि उन्हें सांप सूंघ गया हो. वो इंदिरा गाँधी के घर से आ रहे थे. उनके हाथ में इंदिरा गाँधी पर लिखी उनकी ताज़ा किताब थी, जो 'गिफ़्टरैप्ड' थी. वो इंदिरा गाँधी को अपनी किताब 'गिफ़्ट' करने गए थे. उन्होंने सोचा था कि वहाँ राष्ट्रीय प्रेस मौजूद होगी. लेकिन वहाँ सन्नाटा था. उन्हें एक कोने में बैठा दिया गया."
वो कहते हैं, "थोड़ी देर में उनके स्टाफ़ ने कहा कि इंदिराजी तो दफ़्तर जाने के लिए अपनी कार में बैठने जा रही है. आप वहीं जा कर उनसे मिल लीजिए. डॉम दौड़ते हुए वहाँ पहुंचे. डॉम ने इंदिराजी का अभिवादन किया. उन्होंने कहा 'कहिए'. डॉम बोले,' मैं आपको ये किताब देने आया हूँ.' इंदिरा गाँधी ने कहा, 'बुक? व्हाट बुक? मैं कूड़ा-कर्कट नहीं पढ़ती. आप ये किताब वापस ले जाइए.' इतना कह कर इंदिरा अपनी कार में बैठ गईं."
वो बताते हैं, "सारा सीन 10 सेकेंड में ख़त्म हो गया. डॉम ने ये किस्सा खुद हमें सुनाया. अरुण शौरी ने कहा, 'इंदिरा ने आपकी ये किताब लेने से इंकार कर दिया है. आप ये किताब मुझे क्यों नहीं भेंट दे देते.' जब हमने किताब खोली तो उसके पहले पन्ने पर लिखा था, 'टू सब्जेक्ट ऑफ़ दिस बुक, डॉम.' वो किताब अब भी अरुण शौरी के पास होगी."
लेकिन भारत की तीसरी प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को गेंदे के फूल से 'एलर्जी' थी और उनके स्टाफ़ को निर्देश थे कि उनका कोई भी प्रशंसक उनके पास गेंदे के फूल ले कर न आ पाए.
बहुचर्चित किताब 'द मेरीगोल्ड स्टोरी- इंदिरा गाँधी एंड अदर्स' की लेखिका और वरिष्ठ पत्रकार कुमकुम चड्ढ़ा बताती हैं, "इंदिरा की पूरी ज़िंदगी में उनके स्टाफ़ की सबसे बड़ी जद्दोजहद होती थी कि गेंदे का फूल इंदिरा गाँधी के नज़दीक न पहुंच जाए. वजह ये थी कि उन्हें गेंदे के फूल पसंद नहीं थे."
वो कहती हैं, "अगर कोई उनके पास गेंदे का फूल ले जाने में सफल हो भी जाता था तो उनकी त्योरियाँ चढ़ जाती थीं."
"लेकिन उनका ये गुस्सा उन लोगों के लिए नहीं होता था जो उनके लिए फूल ले कर आते थे, बल्कि अपने स्टाफ़ के लिए होता था कि उनके रहते ये कैसे संभव हो सका."
विडंबना है कि जब इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद उनके पार्थिव शरीर को तीन मूर्ति भवन में लोगों के दर्शनों के लिए रखा गया तो उनके चारों तरफ़ गेंदे के ही फूल थे.
एक समय तो कुमकुम का जी भी चाहा कि वो उठ कर उन फूलों को हटा दें.
वो याद करती हैं, "अगर मेरा बस चलता तो मैं उठ कर उनके पास से गेंदे का हर फूल उठा देती. लेकिन मौक़ा इतना औपचारिक था कि मैं चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाई."
"मैंने धवन की तरफ़ देखा, लेकिन वो भी इतने टूटे हुए थे और बदहवास थे कि उनका भी इस तरफ़ ध्यान नहीं गया. लेकिन अगर इंदिरा गाँधी जीवित होतीं और किसी और के साथ ऐसा हुआ होता वो ज़रूर उठ कर गेंदे के फूल हटवातीं."
जवाहरलाल नेहरू की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इंदिरा गाँधी भी रोज़ सुबह आठ बज कर बीस मिनट पर आम लोगों से मिला करती थीं. इसे उनका 'दर्शन दरबार' कहा जाता था.
हफ़्ते में कम से कम तीन बार कुमकुम चड्ढा इस 'दर्शन दरबार' में मौजूद रहा करती थीं.
कुमकुम बताती हैं कि नत्थू इंदिरा के पीछे छाता लिए खड़े रहते थे, क्योंकि उन्हें धूप से भी 'एलर्जी' थी.
वो कहती हैं, "इंदिरा इस मौके का इस्तेमाल भारत के आम लोगों से मिलने के लिए करती थीं. कभी कभी जब भीड़ अनियंत्रित हो जाती थी, तो उन लोगों को तरजीह दी जाती थी, जो दिल्ली से बाहर से आते थे."
"इस दरबार में दो तरह के लोग आते थे. एक तो वो जो सिर्फ़ इंदिरा गांधी को देखना भर चाहते थे. दूसरे वो जिन्हें छोटे मोटे काम करवाने होते थे, जैसे सरकारी अस्पताल में किसी का इलाज करवाना."
"बहुत से लोग इंदिराजी के पैर छूने की कोशिश करते थे, हाँलाकि उन्हें अपने पैर छुवाना बिल्कुल पसंद नहीं था. एक बुज़ुर्ग शख़्स रोज़ उनके लिए कच्चा नारियल ले कर आते थे. लोग तिरुपति का लड्डू भी लाते थे. उन्हीं के घर पर पहली बार मैंने तिरुपति का प्रसाद खाया था."
इंदिरा गाँधी हमेशा इस बात का ध्यान रखती थीं कि वो दिखती कैसी हैं. एक बार वो अपने एक कैबिनेट मंत्री से इस बात पर नाराज़ हो गई थीं कि उन्होंने इंदिरा गाँधी के हुस्न की तारीफ़ करने की जुर्रत की थी.
कुमकुम चड्ढा याद करती हैं, "श्रीमति गाँधी के साथ एक 'पर्सनल लाइन' पार करने की कोई हिम्मत नहीं कर सकता था. मैंने उनकी उपस्थिति में लोगों को हँसते हुए भी नहीं देखा. लोग बोलते भी तभी थे, जब वो उन्हें बोलने का 'क्यू' देती थी. मध्यप्रदेश के उनके एक मंत्री ने कैबिनेट बैठक के दौरान उनके सौंदर्य की तारीफ़ कर दी थी. उन्होंने उन्हें तुरंत बाहर का रास्ता दिखाया. बाद में जब उन साहब ने उनके दर्शन दरबार में जा कर अपने किए पर अफ़सोस जताने की कोशिश की, तो इंदिरा गाँधी ने उनकी तरफ़ देखा भी नहीं."
इसी तरह उनके गुस्से का शिकार मशहूर अंग्रेज़ी लेखक डॉम मोरेस को भी बनना पड़ा था. उन्होंने इंदिरा गाँधी की जीवनी लिखी थी, 'मिसेज़ गांधी,' जिसके कुछ अंश उनको पसंद नहीं आए थे.
मशहूर प्रकाशक, पत्रकार और लेखक अशोक चोपड़ा एक किस्सा सुनाते हैं, "एक बार मैं इंडियन एक्सप्रेस में अरुण शौरी के दफ़्तर में बैठा हुआ था. तभी मैने देखा कि बहहवास से डॉम मोरेस कमरे में घुसे. ऐसा लग रहा था कि उन्हें सांप सूंघ गया हो. वो इंदिरा गाँधी के घर से आ रहे थे. उनके हाथ में इंदिरा गाँधी पर लिखी उनकी ताज़ा किताब थी, जो 'गिफ़्टरैप्ड' थी. वो इंदिरा गाँधी को अपनी किताब 'गिफ़्ट' करने गए थे. उन्होंने सोचा था कि वहाँ राष्ट्रीय प्रेस मौजूद होगी. लेकिन वहाँ सन्नाटा था. उन्हें एक कोने में बैठा दिया गया."
वो कहते हैं, "थोड़ी देर में उनके स्टाफ़ ने कहा कि इंदिराजी तो दफ़्तर जाने के लिए अपनी कार में बैठने जा रही है. आप वहीं जा कर उनसे मिल लीजिए. डॉम दौड़ते हुए वहाँ पहुंचे. डॉम ने इंदिराजी का अभिवादन किया. उन्होंने कहा 'कहिए'. डॉम बोले,' मैं आपको ये किताब देने आया हूँ.' इंदिरा गाँधी ने कहा, 'बुक? व्हाट बुक? मैं कूड़ा-कर्कट नहीं पढ़ती. आप ये किताब वापस ले जाइए.' इतना कह कर इंदिरा अपनी कार में बैठ गईं."
वो बताते हैं, "सारा सीन 10 सेकेंड में ख़त्म हो गया. डॉम ने ये किस्सा खुद हमें सुनाया. अरुण शौरी ने कहा, 'इंदिरा ने आपकी ये किताब लेने से इंकार कर दिया है. आप ये किताब मुझे क्यों नहीं भेंट दे देते.' जब हमने किताब खोली तो उसके पहले पन्ने पर लिखा था, 'टू सब्जेक्ट ऑफ़ दिस बुक, डॉम.' वो किताब अब भी अरुण शौरी के पास होगी."
Wednesday, February 13, 2019
जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों ने क्यों किया विवाद?
छात्रों का आरोप है कि उनके प्रोफ़ेसर उन पर अभद्र टिप्पणियां करतें हैं. अगर कोई इसका विरोध करने की कोशिश करता है तो वो धमकाने लगते हैं. इनका दावा है कि जो प्रोफ़ेसरों की बात मानता है उसे अच्छे नंबर से पास करते हैं.
ये शिकायतें फाइन आर्ट में अप्लाइड के छात्रों की है. पिछले 14 दिनों से छात्र अप्लाइड आर्ट्स विभाग के विभागाध्यक्ष हफिज़ अहमद के ख़िलाफ़ अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
सोमवार को जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोक्टर ने बताया की छात्रों की शिकायत पर एचओडी को तीन महीने की छुट्टी पर भेज दिया गया है. तब तक के लिए विभागाध्यक्ष का पद किसी और को सौंपा जाएगा.
जामिया मिलिया इस्लामिया के जनसंपर्क अधिकारी और मीडिया संयोजक अहमद अज़ीम ने बताया कि इस मामले के लिए फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित कर दी गई है, जिसमें छह विभागों के डीन शामिल हैं. कमेटी से आग्रह किया गया है कि वो दो हफ़्ते के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप दें.
विरोध कर रहे छात्रों की मांग है कि पहले विभागाध्यक्ष को सस्पेंड किया जाए तब जांच की जाए. एचओडी के पद के साथ इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की जा सकती.
सात फ़रवरी को छात्रों ने प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के लिए एक मार्च निकाला था. इस दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों और प्रोफ़ेसर को बचाने वाले छात्रों के बीच काफ़ी झड़प हुई थी, जिसमें कुछ छात्रों को चोट लगी थी.
उस समय अकांक्षा कौशिक वहीं मौजूद थी, जो एमएएफ की छात्र हैं. उनका कहना है, ''इतने दिनों से शांति से प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन उनके छात्रों ने हमें मारने की कोशिश की. इसमें मुझे चोट लगी और दीपिका भट्ट नाम की लड़की को तो हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा.''
दीपिका बताती हैं, ''वे पूरे डिपार्टमेंट में इकलौते टीचर हैं और इसलिए वे हिटलरगिरी करते हैं. जैसे सेक्शुअल कॉमेंट्स और मैसेज करना, मार्क्स न देना, सिर्फ़ अपने फेवरेट बच्चों को ही मार्क्स देना.''
''अगर कोई अपना काम समय पर नहीं देता उनसे पूछते हैं कि रात को तीन बजे तक जगकर क्या करती हो. रात भर किससे बात करती हो, एक ही लड़के से बात करती हो या चार लोगों से बात करती हो और अगर तुम दर्द में हो तो सुबह जल्दी आओ मैं तुम्हें योगा या वर्कआउट करना सिखाऊंगा. कुछ लड़कियों को उनकी ही फोटो क्रॉप कर के भेजते हैं.''
बीबीसी से बात करने पर दीपिका भट्ट कांप रही थीं. दीपिका वही लड़की हैं जिन्हें सात फ़रवरी के दिन विरोध प्रदर्शन के दौरान चोट लगी थी.
''उस दिन भी हम विभाग में ही मार्च निकाल रहे थे. रजिस्ट्रार ने हमें आश्वासन दिया कि आपके एचओडी को बदल दिया जाएगा. आप जाकर अपनी क्लास लीजिए. इसलिए हम एचओडी से बात करने गए लेकिन उन्होंने हमसे बात ही नहीं की. उनके फेवरेट स्टूडेंट ने मारपीट शुरू कर दी उस दौरान मेरे साथ बतमीजी भी हुई. मुझे धक्का मारकर गिरा दिया गया और गिराने के बाद वे मुझ पर से चलकर गए. थोड़ी देर बाद में बेहोश हो गई और मुझे हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया.''
ये शिकायतें फाइन आर्ट में अप्लाइड के छात्रों की है. पिछले 14 दिनों से छात्र अप्लाइड आर्ट्स विभाग के विभागाध्यक्ष हफिज़ अहमद के ख़िलाफ़ अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
सोमवार को जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रोक्टर ने बताया की छात्रों की शिकायत पर एचओडी को तीन महीने की छुट्टी पर भेज दिया गया है. तब तक के लिए विभागाध्यक्ष का पद किसी और को सौंपा जाएगा.
जामिया मिलिया इस्लामिया के जनसंपर्क अधिकारी और मीडिया संयोजक अहमद अज़ीम ने बताया कि इस मामले के लिए फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित कर दी गई है, जिसमें छह विभागों के डीन शामिल हैं. कमेटी से आग्रह किया गया है कि वो दो हफ़्ते के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंप दें.
विरोध कर रहे छात्रों की मांग है कि पहले विभागाध्यक्ष को सस्पेंड किया जाए तब जांच की जाए. एचओडी के पद के साथ इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं की जा सकती.
सात फ़रवरी को छात्रों ने प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के लिए एक मार्च निकाला था. इस दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों और प्रोफ़ेसर को बचाने वाले छात्रों के बीच काफ़ी झड़प हुई थी, जिसमें कुछ छात्रों को चोट लगी थी.
उस समय अकांक्षा कौशिक वहीं मौजूद थी, जो एमएएफ की छात्र हैं. उनका कहना है, ''इतने दिनों से शांति से प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन उनके छात्रों ने हमें मारने की कोशिश की. इसमें मुझे चोट लगी और दीपिका भट्ट नाम की लड़की को तो हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा.''
दीपिका बताती हैं, ''वे पूरे डिपार्टमेंट में इकलौते टीचर हैं और इसलिए वे हिटलरगिरी करते हैं. जैसे सेक्शुअल कॉमेंट्स और मैसेज करना, मार्क्स न देना, सिर्फ़ अपने फेवरेट बच्चों को ही मार्क्स देना.''
''अगर कोई अपना काम समय पर नहीं देता उनसे पूछते हैं कि रात को तीन बजे तक जगकर क्या करती हो. रात भर किससे बात करती हो, एक ही लड़के से बात करती हो या चार लोगों से बात करती हो और अगर तुम दर्द में हो तो सुबह जल्दी आओ मैं तुम्हें योगा या वर्कआउट करना सिखाऊंगा. कुछ लड़कियों को उनकी ही फोटो क्रॉप कर के भेजते हैं.''
बीबीसी से बात करने पर दीपिका भट्ट कांप रही थीं. दीपिका वही लड़की हैं जिन्हें सात फ़रवरी के दिन विरोध प्रदर्शन के दौरान चोट लगी थी.
''उस दिन भी हम विभाग में ही मार्च निकाल रहे थे. रजिस्ट्रार ने हमें आश्वासन दिया कि आपके एचओडी को बदल दिया जाएगा. आप जाकर अपनी क्लास लीजिए. इसलिए हम एचओडी से बात करने गए लेकिन उन्होंने हमसे बात ही नहीं की. उनके फेवरेट स्टूडेंट ने मारपीट शुरू कर दी उस दौरान मेरे साथ बतमीजी भी हुई. मुझे धक्का मारकर गिरा दिया गया और गिराने के बाद वे मुझ पर से चलकर गए. थोड़ी देर बाद में बेहोश हो गई और मुझे हॉस्पिटल में एडमिट करवाया गया.''
Wednesday, February 6, 2019
इंटरव्यू में अटपटे सवालों के होते हैं कई मायने
मैनचेस्टर की 22 साल की ओलिविया ब्लैंड संचार के क्षेत्र में नौकरी खोज रही हैं. वो जानती हैं कि इंटरव्यू में आम तौर पर क्या होता है.
हाथ मिलाना, आवेदकों की ताक़त और कमज़ोरियों के बारे में कुछ सवाल, सीवी का निरीक्षण और फिर इंटरव्यू ख़त्म.
वो कहती हैं, "ऐसे इंटरव्यू आम तौर पर अनौपचारिक होते हैं. वे दो घंटे लंबे तो बिल्कुल भी नहीं होते."
लेकिन जनवरी के आख़िरी हफ़्ते में टेक्नोलॉजी कंपनी वेब एप्लिकेशंस यूके में हुए इंटरव्यू में उनके आंसू निकल आए.
ब्लैंड ने आरोप लगाए कि कंपनी के चीफ़ एक्जीक्यूटिव क्रेग डीन ने इंटरव्यू में उन्हें नीचा दिखाया और संगीत की रुचि से लेकर उनके मां-बाप की शादी तक हर बात के लिए अपमानित किया.
ब्लैंड को नौकरी की पेशकश की गई, लेकिन डीन के व्यवहार को अनुचित बताकर उन्होंने पेशकश ठुकरा दी.
वो बताती हैं, "मेरे लेखन पर हमला करने से लेकर मुझ पर हमला करने तक चले गए, यहां तक कि मैं कैसे बैठती हूं और हाथों को कैसे मोड़कर रखती हूं."
ब्लैंड के ट्वीट को 10 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने शेयर किया. डीन ने माफ़ी मांगते हुए एक पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने कहा कि उनका इरादा किसी का दिल दुखाने का नहीं था.
वेब एप्लिकेशंस यूके ने सार्वजनिक रूप से ओलिविया ब्लैंड के दावों का खंडन किया, लेकिन टिप्पणी के लिए बीबीसी कैपिटल को जवाब नहीं दिया.
ब्लैंड ने जिस तरह के अनुभव का ज़िक्र किया है, उसे 'तनाव साक्षात्कार' कहा जाता है.
इस तरह के इंटरव्यू में यह देखा जाता है कि नौकरी के लिए आए आवेदक अपेक्षित सवालों और जवाबों के कंफ़र्ट ज़ोन से बाहर के दबाव से कैसे निपटते हैं.
टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में हाल के वर्षों तक एक प्रवृत्ति प्रचलित थी. इसमें इंटरव्यू लेने वाले लोग आवेदकों से कुछ अजीब से सवाल करते थे, जैसे- मेनहोल का ढक्कन गोल क्यों होता है.
कई बार इंटरव्यू के दौरान ही उनसे कुछ डिजाइन बनाने को कहा जाता था.
इसका मक़सद सटीक उत्तर पाना नहीं होता था, बल्कि इसमें यह देखा जाता था कि कोई आवेदक कैसे प्रतिक्रिया करता है और वह किस तरह सोचता है.
एमआईटी (MIT) में मैनेजेरियल कम्युनिकेशन के सीनियर लेक्चरार नील हार्टमन कहते हैं, "निश्चित तौर पर कई पदों के साथ अलग-अलग तरह के तनाव जुड़े होते हैं. जैसे- लक्ष्य हासिल करना, समयसीमा का पालन करना, मुश्किल ग्राहकों से निपटना वगैरह."
"तनाव साक्षात्कार में उन स्थितियों को पैदा किया जाता है और देखा जाता है कि आवेदक उन चुनौतियों को कैसे संभाल सकता है."
इन्वेंटिव टैलेंट कंसल्टिंग के अध्यक्ष किम रूयले का कहना है कि तनाव साक्षात्कार में कुछ ख़ास परिस्थितियां भी बनाई जा सकती हैं.
मसलन, कस्टमर सर्विस एजेंट की जांच करना, जिनको गालियों से भरे फ़ोन कॉल से भी निपटने को तैयार रहने की ज़रूरत होती है. लेकिन इसके लिए आवेदक को पहले बता देना चाहिए.
रूयले का कहना है कि मुश्किल सवाल पूछने और किसी उम्मीदवार को नीचा दिखाने में अंतर होता है. किसी भी दफ़्तर में गाली-गलौच अनुचित है और इसे इंटरव्यू का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए.
पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी में ऑपरेशन्स एंड इंफॉर्फेशन मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर मौरिस श्वेत्ज़र कहते हैं, "तनाव साक्षात्कार न तो नए हैं और न ही ख़त्म होने वाले हैं."
दुनिया के दूसरे देशों के मुक़ाबले अमरीका में ऐसे इंटरव्यू ज़्यादा होते हैं. लेकिन इनका इस्तेमाल एक विशेष तरह के बॉस ही करते हैं.
श्वेत्ज़र ने तीन तरह के मैनेजरों की पहचान की है जो ऐसे इंटरव्यू लेते हैं.
ये हैं- अत्यधिक तनाव के माहौल में काम करने वाले मैनेजर, कंपनी में नौकरियों की ज़्यादा मांग का अनुभव करने वाले मैनेजर और इंटरव्यू के दौरान आवदेकों से कुछ सीखने की कोशिश करने वाले मैनेजर.
हाथ मिलाना, आवेदकों की ताक़त और कमज़ोरियों के बारे में कुछ सवाल, सीवी का निरीक्षण और फिर इंटरव्यू ख़त्म.
वो कहती हैं, "ऐसे इंटरव्यू आम तौर पर अनौपचारिक होते हैं. वे दो घंटे लंबे तो बिल्कुल भी नहीं होते."
लेकिन जनवरी के आख़िरी हफ़्ते में टेक्नोलॉजी कंपनी वेब एप्लिकेशंस यूके में हुए इंटरव्यू में उनके आंसू निकल आए.
ब्लैंड ने आरोप लगाए कि कंपनी के चीफ़ एक्जीक्यूटिव क्रेग डीन ने इंटरव्यू में उन्हें नीचा दिखाया और संगीत की रुचि से लेकर उनके मां-बाप की शादी तक हर बात के लिए अपमानित किया.
ब्लैंड को नौकरी की पेशकश की गई, लेकिन डीन के व्यवहार को अनुचित बताकर उन्होंने पेशकश ठुकरा दी.
वो बताती हैं, "मेरे लेखन पर हमला करने से लेकर मुझ पर हमला करने तक चले गए, यहां तक कि मैं कैसे बैठती हूं और हाथों को कैसे मोड़कर रखती हूं."
ब्लैंड के ट्वीट को 10 हज़ार से ज़्यादा लोगों ने शेयर किया. डीन ने माफ़ी मांगते हुए एक पोस्ट लिखी जिसमें उन्होंने कहा कि उनका इरादा किसी का दिल दुखाने का नहीं था.
वेब एप्लिकेशंस यूके ने सार्वजनिक रूप से ओलिविया ब्लैंड के दावों का खंडन किया, लेकिन टिप्पणी के लिए बीबीसी कैपिटल को जवाब नहीं दिया.
ब्लैंड ने जिस तरह के अनुभव का ज़िक्र किया है, उसे 'तनाव साक्षात्कार' कहा जाता है.
इस तरह के इंटरव्यू में यह देखा जाता है कि नौकरी के लिए आए आवेदक अपेक्षित सवालों और जवाबों के कंफ़र्ट ज़ोन से बाहर के दबाव से कैसे निपटते हैं.
टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में हाल के वर्षों तक एक प्रवृत्ति प्रचलित थी. इसमें इंटरव्यू लेने वाले लोग आवेदकों से कुछ अजीब से सवाल करते थे, जैसे- मेनहोल का ढक्कन गोल क्यों होता है.
कई बार इंटरव्यू के दौरान ही उनसे कुछ डिजाइन बनाने को कहा जाता था.
इसका मक़सद सटीक उत्तर पाना नहीं होता था, बल्कि इसमें यह देखा जाता था कि कोई आवेदक कैसे प्रतिक्रिया करता है और वह किस तरह सोचता है.
एमआईटी (MIT) में मैनेजेरियल कम्युनिकेशन के सीनियर लेक्चरार नील हार्टमन कहते हैं, "निश्चित तौर पर कई पदों के साथ अलग-अलग तरह के तनाव जुड़े होते हैं. जैसे- लक्ष्य हासिल करना, समयसीमा का पालन करना, मुश्किल ग्राहकों से निपटना वगैरह."
"तनाव साक्षात्कार में उन स्थितियों को पैदा किया जाता है और देखा जाता है कि आवेदक उन चुनौतियों को कैसे संभाल सकता है."
इन्वेंटिव टैलेंट कंसल्टिंग के अध्यक्ष किम रूयले का कहना है कि तनाव साक्षात्कार में कुछ ख़ास परिस्थितियां भी बनाई जा सकती हैं.
मसलन, कस्टमर सर्विस एजेंट की जांच करना, जिनको गालियों से भरे फ़ोन कॉल से भी निपटने को तैयार रहने की ज़रूरत होती है. लेकिन इसके लिए आवेदक को पहले बता देना चाहिए.
रूयले का कहना है कि मुश्किल सवाल पूछने और किसी उम्मीदवार को नीचा दिखाने में अंतर होता है. किसी भी दफ़्तर में गाली-गलौच अनुचित है और इसे इंटरव्यू का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए.
पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी में ऑपरेशन्स एंड इंफॉर्फेशन मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर मौरिस श्वेत्ज़र कहते हैं, "तनाव साक्षात्कार न तो नए हैं और न ही ख़त्म होने वाले हैं."
दुनिया के दूसरे देशों के मुक़ाबले अमरीका में ऐसे इंटरव्यू ज़्यादा होते हैं. लेकिन इनका इस्तेमाल एक विशेष तरह के बॉस ही करते हैं.
श्वेत्ज़र ने तीन तरह के मैनेजरों की पहचान की है जो ऐसे इंटरव्यू लेते हैं.
ये हैं- अत्यधिक तनाव के माहौल में काम करने वाले मैनेजर, कंपनी में नौकरियों की ज़्यादा मांग का अनुभव करने वाले मैनेजर और इंटरव्यू के दौरान आवदेकों से कुछ सीखने की कोशिश करने वाले मैनेजर.
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