देश इस समय पूरी तरह चुनावी मोड में पहुंच चुका है, राजनेता देश की लंबाई और चौड़ाई नापते हुए रैलियों को संबोधित कर रहे हैं.
चुनाव प्रचार शोर से साराबोर है लेकिन इसमें करोड़ों लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर कम ही बात होती है.
पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर का छोटा सा गांव लीसांग पिछले साल दुनियाभर में चर्चा में आ गया था. वह 'भारत का आख़िरी गांव था जहां बिजली पहुंची थी.'
दशकों से राजनीतिक पार्टियां अपने चुनावी घोषणापत्रों में बिजली के साथ-साथ सड़क और पानी का वादा करती रही हैं.
अप्रैल 2018 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि 'लीसांग में अब बिजली पहुंच चुकी है और वह सशक्त हो गया है' तब यह समझा गया कि सरकार तीन मुख्य मुद्दों में से कम से कम एक पर ध्यान दे रही है.
लेकिन जब मैं बीते सप्ताह वहां पहुंची तो देखा कि बिजली की आपूर्ति अनियमित थी और गांव के लोगों के पास न तो 'बिजली' थी और न ही वह 'सशक्त' दिखे.
13 परिवार का गांव
राजधानी इम्फ़ाल से 80 किलोमीटर दूर इस गांव में कुकी हिल जनजाति के 13 परिवार हैं जिनमें तकरीबन 70 सदस्य हैं.
लेकिन यहां पहुंचना इतना आसान नहीं है. सबसे नज़दीकी शहर कांगपोकपी है जिसके हाइवे का 35 किलोमीटर का हिस्सा बेहद जर्जर है. आख़िरी तीन किलोमीटर पथरीला रास्ता है जिस पर मोटरसाइकिल से या पैदल ही जाया जा सकता है. बरसात में यह गांव लगभग बाकी दुनिया से कट जाता है और रास्ता पानी से भर जाता है.
लीसांग में कोई स्कूल या स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. हालांकि, यहां के निवासियों के पास मतदाता पहचान पत्र हैं लेकिन कोई भी राजनीतिक बदलाव लाने के लिए वे बेहद कम हैं.
गांव के मुखिया टोंगसाट हाओकिप कहते हैं कि अन्य पड़ोसी गांवों में 2017 में बिजली आ गई थी लेकिन जब उन्होंने इसके बारे में पूछताछ की तो उन्हें बताया कि वे 'योजना में नहीं हैं.'
वह कहते हैं, "किसी ने हमें कोई कारण नहीं बताया तो हमने कांगपोकपी के एक बड़े बिलजी विभाग के अधिकारी से बातचीत की. उन्होंने हमसे कहा कि आप अगले साल हमारी सूची में शीर्ष पर हैं. आप संयम रखिए."
पिछले साल अप्रैल में गांवों में अचानक चहल-पहल बढ़ गई. पहले कुछ अधिकारी यहां जांच के लिए आए और फिर अगले दो सप्ताह में खंभे, तार, ट्रांसफ़ॉर्मर और दूसरे बिजली के सामान आने लगे. आख़िरकार गांव के लोगों को बताया गया कि वे 27 अप्रैल को शाम 5-6 बजे तक 'ग्रिड से कनेक्ट' हो जाएंगे.
लेमनिथन लोटजेम उन 20 से 30 लोगों के समूह में शामिल थीं जो इस मौक़े पर गांव के मुखिया के घर पर इकट्ठा हुए थे. वहां चाय बनाई गई थी और स्विच ऑन करके सब की निगाहें बल्ब की ओर टिकी हुई थीं.
लोटजेम बल्ब के बिलकुल नीचे थीं जब वह जल उठा. वह कहती हैं कि उस रात गांव में कोई नहीं सोया. पूरा गांव एक घर में जुटा जहां पर एक टीवी था जिसे पूरी रात देखा गया.
नेहकाम डाउंगुल कहते हैं कि यह फिर से पैदा होने जैसा था. कुछ दिनों के बाद कई परिवारों ने टीवी ख़रीदे और बहुत सी महिलाएं वॉशिंग मशीन और राइस कूकर ख़रीदने के ख़्वाब भी देखने लगीं.
उस दिन के बाद से अब एक साल होने को हैं और गांववालों ने मुझे बताया कि अच्छे दिनों में उन्हें पांच से छह घंटे तक बिजली मिलती है.
एक छोटी सी गड़बड़ी को ठीक होने में भी कम से कम तीन दिन लगते हैं. पिछले साल तो एक बार लीसांग तीन महीने तक अंधेरे में डूबा रहा.
मणिपुर में बिजली विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी एच शांतिकुमार सिंह ने माना कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि वह ठीक करने वहां जा ही नहीं पाए.
वो कहते हैं, "इस दूर दराज़ के इलाक़े में पहुंचना बहुत मुश्किल है, खासकर भूस्खलन के समय."
लेकिन उन्होंने इस बात से इनकार किया कि गांव को केवल छह घंटे ही बिजली मिलती है. उनका कहना है कि राज्य में सभी को पर्याप्त बिजली की आपूर्ति होती है.
हालांकि जिस दिन मैं गई, गांव में बिजली नहीं थी. एक घंटे बाद बिजली आई लेकिन 15 मिनट में फिर चली गई.
आठ बजे से चार बजे तक खेतों में काम करने वाली लाटजेम कहती हैं कि जब शाम को बिजली होती है तो घर के काम निबटाती हैं और टीवी देखती हैं.
डोउंगल कहते हैं कि बारिश और तेज़ हवा में हमेशा बिजली कटती है और अब तो गांव वाले मज़ाक करते हैं कि 'अगर किसी बिजली के खंभे पर कुत्ता पेशाब कर दे तो भी बिजली चली जाती है.'
प्रधानमंत्री मोदी ने अगस्त 2015 में घोषणा की थी कि 1000 दिनों के अंदर हरेक गांव को बिजली पहुंच जाएगी. इसी के तहत लीसांग में बिजली आई.
दिल्ली के काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरोन्मेंट एंड वॉटर से जुड़े अभिषेक जैन कहते हैं कि 2014 में जब मोदी आए तो उससे पहले ही भारत के क़रीब छह लाख गांवों में 97.5 प्रतिशत में बिजली पहुंच चुकी थी.
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