मोदी सरकार में उनकी हैसियत भले राज्य मंत्री की रही हो, लेकिन एक हक़ीक़त ये भी है कि पिछले कुछ सालों में बिहार की जातिगत राजनीति में उपेंद्र कुशवाहा एक ताक़त के तौर पर उभर कर सामने आए हैं.
इसका अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि पिछले कुछ महीनों में एनडीए के सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के नेता नीतीश कुमार और भारतीय जनता पार्टी की सरकार की लगातार आलोचना के बाद भी नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने उन्हें बाहर का रास्ता नहीं दिखाया था.
ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि आख़िर उपेंद्र कुशवाहा की राजनीति है क्या और बिहार में उनकी राजनीतिक हैसियत कितनी है? इन दो सवालों के जवाब के बाद इस बात को आंका जा सकता है कि बिहार में यूपीए का दामन थामने के बाद कुशवाहा बिहार की राजनीति को कितना बदल पाएंगे?
इन सवालों की पड़ताल शुरू करने से पहले थोड़ी बात उपेंद्र कुशवाहा और नीतीश कुमार के आपसी रिश्तों की.
थोड़ा पीछे चलते हैं, साल 2003 में, नीतीश कुमार ने उपेंद्र कुशवाहा को बिहार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाया था. यानी बिहार विधानसभा में मुख्यमंत्री के बाद सबसे ताक़तवर कुर्सी कुशवाहा के पास रही.
नीतीश कुमार के साथ अपने संबंधों को लेकर उपेंद्र कुशवाहा कई बार दोहरा चुके हैं कि वे उन्हें अपना बड़ा भाई मानते रहे हैं. लेकिन 2003 के बाद जब 2005 में नीतीश कुमार पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने उपेंद्र कुशवाहा से उनका बंगला खाली कराने के लिए उनकी ग़ैरमौजूदगी में उनके घर का सामान तक बाहर फिंकवा दिया.
कुशवाहा आज तक उस बात को नहीं भूल पाए हैं कि जिस शख़्स को बिहार का मुख्यमंत्री बनवाने के लिए वे दिन रात एक करके बिहार के इलाकों में घूम रहे थे, उसने सत्ता आते ही घर में मौजूद उनकी अकेली मां की परवाह नहीं करते हुए घर का सारा सामान सड़कों पर फिंकवा दिया था.
कुशवाहा समता पार्टी से बाहर निकले, राष्ट्रीय समता पार्टी बनाई और अपनी राजनीतिक जमीं बनानी शुरू कर दी, 2009 के लोकसभा चुनाव में उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार की सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए थे और इन उम्मीदवारों ने 25 हज़ार से लेकर 40 हज़ार तक वोट हासिल किए.
नीतीश के लिए मुश्किलें
नीतीश कुमार को अंदाज़ा हो गया था कि कुशवाहा उनके लिए मुश्किल खड़ी कर सकते हैं लिहाजा कुशवाहा की एक सार्वजनिक सभा में पहुंचकर उन्होंने उपेंद्र कुशवाहा को गले लगाकर सब शिकायतें दूर करने का भरोसा दिया और कुशवाहा को राज्य सभा में भेज दिया.
कुशवाहा राज्य सभा में आ तो गए लेकिन एक राजनीतिक ताकत के तौर पर उभरने का सपना वे भूल नहीं पाए और 2013 में एक दिन राज्यसभा से इस्तीफ़ा देकर वे फिर से सड़क पर आ गए. अपनी नई पार्टी बनाई राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के नाम से.
2014 में अपनी ज़ोर-आजमाइश से नरेंद्र मोदी और अमित शाह से मिलकर एनडीए में शामिल हुए और तीन सीटें हासिल कर केंद्र में मंत्री बन गए. तब नीतीश कुमार अकेले थे और लोकसभा चुनाव में उन्हें अपनी ताक़त का अंदाज़ा भी हो गया था. करारी हार से तिलमिलाए नीतीश ने पुरानी दुश्मनी भुला कर लालू प्रसाद यादव से हाथ मिला लिया.
No comments:
Post a Comment